पटना। बिहार की राजनीति एक बड़े मोड़ पर खड़ी है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने की आधिकारिक पुष्टि के बाद राज्य का सियासी पारा सातवें आसमान पर है। जदयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा ने साफ कर दिया है कि नीतीश कुमार 30 मार्च तक बिहार विधान परिषद से इस्तीफा दे देंगे। यह एक संवैधानिक अनिवार्यता है क्योंकि वे अब संसद के ऊपरी सदन का हिस्सा बनने जा रहे हैं। लेकिन इस बदलाव ने एनडीए के भीतर और बाहर नई बहस छेड़ दी है।

​भाजपा को होगा भारी नुकसान

​पूर्व सांसद और बाहुबली नेता आनंद मोहन ने नीतीश कुमार के इस फैसले पर कड़ा ऐतराज जताया है। पटना एयरपोर्ट पर मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा कि भले ही यह फैसला नीतीश कुमार का व्यक्तिगत हो, लेकिन बिहार की जनता इससे बेहद आहत है। मोहन ने चेतावनी देते हुए कहा, नीतीश के जाने से जदयू को तो घाटा होगा ही, लेकिन उससे कहीं बड़ा नुकसान भाजपा को उठाना पड़ेगा। उनके अनुसार, 2025 से 2030 तक के लिए जनता ने नीतीश के चेहरे पर जनादेश दिया था, और इस भरोसे को तोड़ना आत्मघाती साबित हो सकता है।

​अमित शाह पर परोक्ष हमला

​बिना नाम लिए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह (जिन्हें अक्सर भाजपा का चाणक्य कहा जाता है) पर निशाना साधते हुए आनंद मोहन ने कहा कि जो रणनीतिकार इसे मास्टरस्ट्रोक मान रहे हैं, वे गलतफहमी में हैं। उन्होंने तर्क दिया कि नीतीश के हटने से बिहार का लव-कुश (कुर्मी-कोयरी) समीकरण बिखर जाएगा, जिसका सीधा और मुफ्त लाभ विपक्षी दलों को मिलेगा। उनके मुताबिक, इस फैसले से एनडीए का जमीनी आधार कमजोर हो सकता है।

​निशांत कुमार को फुल पावर देने की वकालत

​नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार की राजनीति में एंट्री को आनंद मोहन ने एक शॉक एब्जॉर्वर (झटका सहने वाला) करार दिया। उन्होंने मांग की कि यदि निशांत को मैदान में उतारना है, तो उन्हें फुल फ्लेज्ड पावर दी जाए। उपमुख्यमंत्री के पद पर तंज कसते हुए उन्होंने कहा कि उपमुख्यमंत्री का मतलब चुप-मुख्यमंत्री होता है। साथ ही, उन्होंने सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री पद के लिए एक सक्षम और बेहतर विकल्प बताया।

​पटना की सड़कों पर पोस्टर वॉर

​इधर, पटना के वीरचंद पटेल रोड पर रातों-रात भावुक पोस्टर चस्पा कर दिए गए हैं। इन पोस्टरों पर बड़े अक्षरों में लिखा है बिहार छोड़कर न जाएं मुख्यमंत्री। ये पोस्टर समर्थकों की उस गहरी चिंता को दर्शाते हैं जो नीतीश के दिल्ली जाने के बाद बिहार की सत्ता संरचना में पैदा होने वाले शून्य को लेकर आशंकित हैं।