सोहराब आलम/मोतिहारी। सुगौली में स्थानीय नगर पंचायत की बुधवार को आयोजित सामान्य बोर्ड की बैठक एक बार फिर गुटबाजी और अव्यवस्था की भेंट चढ़ गई। जनहित के मुद्दों पर ठोस निर्णय लेने के उद्देश्य से बुलाई गई यह बैठक घंटों तक तीखी नोकझोंक, निजी स्वार्थों और आरोपों-प्रत्यारोपों के भंवर में फंसी रही। आलम यह था कि चर्चा विकास की होनी थी, लेकिन माहौल आपसी टकराव का अखाड़ा बन गया।
तानाशाही के आरोपों के बीच वॉकआउट
मुख्य पार्षद नसरीन अली ने पार्षदों पर बैठक में व्यवधान डालने का आरोप लगाया। उनका कहना था कि कुछ चुनिंदा वार्डों की समस्याओं को प्राथमिकता दी जा रही थी, जबकि बाकी शिकायतों को नजरअंदाज किया गया। मुख्य पार्षद के अनुसार, उन पर चर्चा अधूरी छोड़कर कार्यवाही रजिस्टर बंद करने का दबाव बनाया गया। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक सभी 20 वार्डों की समस्याएं दर्ज नहीं होंगी, बैठक संपन्न नहीं मानी जाएगी। इसी विवाद के चलते वे बैठक बीच में ही छोड़कर चली गईं।
कार्यपालक पदाधिकारी की मौजूदगी में हुआ समझौता
दूसरी ओर, वार्ड पार्षदों ने मुख्य पार्षदों पर ही मनमानी और तानाशाही का आरोप जड़ा। विवाद तब और गहरा गया जब मुख्य पार्षद द्वारा रजिस्टर को आवास पर ले जाकर बंद करने का प्रस्ताव दिया गया, जिसे पार्षदों ने सिरे से खारिज कर दिया। काफी देर तक चले अफरा-तफरी के माहौल के बाद, कार्यपालक पदाधिकारी धर्मेंद्र कुमार की मध्यस्थता में सभी पार्षदों ने हस्ताक्षर कर सहमति दर्ज कराई, तब जाकर रजिस्टर क्लोज हो सका।
प्रशासनिक विफलता और जनता का नुकसान
यह पूरी घटना नगर पंचायत में व्याप्त प्रशासनिक उदासीनता और आपसी तालमेल की कमी को उजागर करती है। बोर्ड की बैठकों का बार-बार हंगामे की भेंट चढ़ना यह दर्शाता है कि जनहित के मुद्दों से ज्यादा प्राथमिकता व्यक्तिगत वर्चस्व को दी जा रही है। अब सवाल यह उठता है कि क्या जिम्मेदार अधिकारी इस अराजकता पर लगाम लगाएंगे या सुगौली की जनता को विकास की इस अनदेखी की कीमत यूं ही चुकानी पड़ेगी?
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