Rohini Acharya: राबड़ी आवास में बीते 29 मार्च को चैता और लौंडा नाच का आयोजन हुआ था। कार्यक्रम में लालू यादव, राबड़ी देवी और तेजस्वी यादव मौजूद थे। वहीं, इसके अलावा राजद के कई बड़े नेताओं को भी कार्यक्रम में बुलाया गया था। कई सालों बाद राबड़ी आवास पर ऐसे सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन हुआ, जिसके बाद लालू यादव के पुराने दिनों व उनके अंदाज को लेकर चर्चा होने लगी।

हालांकि बीजेपी और जदयू के कुछ नेताओं लौंडा नाच कराने पर आपत्ति जताते हुए इसे लंपट संस्कृति बताया, जिसपर अब लालू यादव की बेटी रोहिणी आचार्य ने कड़ा पलटवार करते हुए तगड़ा जवाब दिया है।

रोहिणी आर्चाय ने विरोधियों को दिया तगड़ा जवाब

रोहिणी आचार्य ने सोशल मीडिया एक्स पर एक लंबा-चौड़ा पोस्ट लिखते हुए कहा कि, लालू जी के द्वारा बिहार की कला एवं सांस्कृतिक विरासत के एक अहम् स्वरुप “लौंडा नृत्य” करवाए जाने पर कुछ लोगों की अनावश्यक आपत्ति है, ये ऐसे लोग हैं जिन्हें पूर्वाग्रह से ग्रसित हो कर कुछ भी बोलना है और जिन्हें बिहार की परंपरागत सांस्कृतिक विरासत के बारे में तनिक भी जानकारी नहीं है l

अश्लील गानों और नृत्य पर मौन रहने वाले लोग…

रोहिणी आचार्य ने कहा कि, सरकारी समारोहों-राजकीय-महोत्सवों आयोजनों के मंचों पर बॉलीवुड के फूहड़ गानों पर अश्लील नृत्य की प्रस्तुति पर मौन रहने वाले लोगों को बयान देने से पहले ये जानना चाहिए कि ‘लौंडा नाच’ बिहार और पूर्वांचल (पूर्वी उत्तर प्रदेश) का एक पारंपरिक लोक नाट्य और नृत्य रूप है, जिसमें पुरुष महिलाओं के वेश में सामाजिक-सांस्कृतिक समारोहों और शादियों में अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। उन्होंने कहा कि, भोजपुरी के शेक्सपियर कहे जाने वाले महान लोक कलाकार स्व. भिखारी ठाकुर जी के द्वारा नृत्य की इस विधा (लौंडा नाच) को लोकप्रिय बनाया गया था और सदियों से चली आ रही ये नृत्य की परंपरा, सामाजिक संदेश और व्यंग्य सम्प्रेषण का एक सशक्त माध्यम है।

इसलिए पुरुषों को निभानी पड़ी महिलाओं की भूमिका

रोहिणी आचार्य ने कहा कि, लौंडा नाच की यह परंपरा सदियों पुरानी है, और उस समय से ज्यादा लोकप्रिय हुई जब महिलाओं को पुरुषों की सभाओं में नृत्य करने के पीछे असामाजिक निषेध-वर्जनाएं प्रभावी थीं और जिसके कारण पुरुषों को महिलाओं की भूमिका निभानी पड़ी। स्व. भिखारी ठाकुर जी के द्वारा पलायन, दहेज, शराबखोरी, विरह की जिंदगी जी रही विवाहिताओं और लैंगिक समानता जैसे सामाजिक मुद्दों को उजागर करने के माध्यम के रूप में इस नृत्य का प्रयोग किया गया और लालू जी भी एक अर्से से इस लोक परंपरा को विलुप्त होने से बचाने और वैचारिक सम्प्रेषण के लिए इसका आयोजन करवाते आ रहे हैं, लालू जी सामाजिक- सांस्कृतिक परम्पराओं को संजोने के लिए ही जाने जाते हैं l

लौंडा नाच एक महत्यवपूर्ण सांस्कृतिक प्रदर्शन-रोहिणी

उन्होंने कहा कि, गौरतलब है कि पद्मश्री से सम्मानित रामचंद्र मांझी जी जैसे ख्यातिप्राप्त कलाकार ने भी इस परंपरा (लौंडा नाच) को जीवित रखने में अपना अहम् योगदान दिया और 90 वर्ष की आयु में भी इसका प्रदर्शन करते रहे। रोहिणी ने कहा कि, जिन लोगों के पास जानकारी का अभाव है, वही नृत्य की इस शैली (लौंडा नाच) के बारे में अनर्गल बयानबाजी करते हैं और ये भूल जाते हैं की भोजपुरी भाषी क्षेत्रों में आज भी ये एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक प्रदर्शन है l कैरिबियन देशों में आज भी, जहां अच्छी खासी संख्या में भोजपुरी भाषी लोग हैं, इसका आयोजन किया जाता है।

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