सूरत के वेद दरवाजा इलाके में पिछले दिनों 100 से अधिक झुग्गियों को बुलडोजर के माध्यम से पूरी तरह ध्वस्त कर दिया गया. आरोप है कि इस कार्रवाई के पहले कोई भी कानूनी नोटिस नहीं दिया गया था. मामला जब तूल पकड़ा तो सवाल उठा कि, किसके आदेश पर यह एक्शन हुआ लेकिन अब इसकी जिम्मेदारी कोई भी सरकारी विभाग लेने को तैयार नहीं है. इलाके का कोई भी सरकारी विभाग यह बताने को राजी नहीं है कि इन झुग्गियों पर बुलडोजर क्यों चला और किसने चलवाया? बता दें कि, इन झुग्गियों में अधकतर मुस्लिम समुदाय के लोग रहते थे.
नगर निगम के अधिकारी और भारी पुलिस बल था मौजूद
पूरा मामला 3 जून का है. नासिर नगर इलाके में अचानक भारी भरकम मशीनें और बुलडोजर पहुंचते हैं. देखते ही देखते करीब 100 परिवारों की छतें छीन ली जाती हैं. स्थानीय लोगों का कहना है कि जब यह तोड़फोड़ चल रही थी, तब वहां सूरत नगर निगम के अधिकारी और भारी संख्या में पुलिस बल मौजूद था. जब घर मलबे में तब्दील हो गए और पीड़ित परिवारों का गुस्सा भड़का, तो असली ड्रामा शुरू हुआ. सूरत नगर निगम ने साफ शब्दों में कह दिया कि उन्होंने तोड़फोड़ का कोई आदेश जारी ही नहीं किया था. निगम का कहना है कि इस कार्रवाई में उनकी कोई भूमिका नहीं है.
इसलिए हुई कार्रवाई
स्थानीय निवासियों और सूत्रों के मुताबिक, यह पूरी कवायद नासिर नगर के ठीक पीछे बन रहे एक प्राइवेट कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट को रास्ता देने के लिए की गई थी. आरोप है कि बिल्डर के फायदे के लिए रातों-रात सड़क चौड़ी करने का प्लान बनाया गया और सालों से रह रहे लोगों के आशियाने उजाड़ दिए गए. हैरानी की बात यह है कि बिना किसी आधिकारिक नोटिस या कानूनी प्रक्रिया के इतनी बड़ी कार्रवाई को अंजाम दे दिया गया और कानून व्यवस्था बनाए रखने वाली पुलिस मूकदर्शक बनी रही.
हाई कोर्ट पहुंचा मामला
वहीं, अब इस बस्ती में रहने वाले हुसैन अजीज शेख ने सोमवार को गुजरात हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की. उन्होंने आरोप लगाया कि इन झुग्गियों को तोड़ने से पहले कानूनी नियमों का पालन नहीं किया गया. उन्होंने कोर्ट से झुग्गियों को तोड़ने के इस अभियान पर तुरंत रोक लगाने की मांग की. उन्होंने कहा कि बिना किसी नोटिस दिए ये कार्रवाई की गई.
हर कोई एक दूसरे पर मढ़ रहा दोष
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, इस पूरे मामले में सबसे बड़ी बात ये है कि कोई भी विभाग इस तोड़फोड़ की जिम्मेदारी नहीं ले रहा है. सूरत नगर निगम ने कहा इसमें उसकी कोई भूमिका नहीं है जबकि पुलिस ने सारा दोष नगर निगम पर मढ़ दिया. वहीं, बीजेपी के स्थानीय विधायक विनू मोराडिया ने सोमवार को कहा कि इसमें कुछ गड़बड़ है. आरोप लग रहा है कि यह तोड़फोड़ बिना किसी नोटिस या तय कानूनी प्रक्रिया के की गई. सवाल पुलिस की भूमिका पर उठ रहे हैं लेकिन वे सारा दोष नगर निगम पर डाल रहे हैं.
निगम के कमिश्नर बोले- हम तो नाप-जोख करने गए थे
उधर, नगर निगम ने साफ मना किया है कि उन्होंने घर गिराने का कोई आदेश नहीं दिया था. निगम के कमिश्नर एन नागराजन ने सोमवार को कहा कि हमारे अधिकारी वहां तोड़फोड़ करने नहीं सिर्फ सड़क की नाप-जोख (सीमांकन) करने गए थे. उन्होंने ये भी कहा कि यह जमीन निजी स्वामित्व वाली है और भूखंड का एक हिस्सा नगर नियोजन योजना के तहत सड़क निर्माण के लिए आवंटित किया गया है. हमारा काम पहले सीमांकन करना है और फिर कुछ दिनों बाद विध्वंस करना है. यह विध्वंस हमारे द्वारा नहीं किया गया.
पुलिस की मौजूदगी में किसने चलाया बुलडोजर?
मगर वहां रहने वाले लोगों का कहना है कि सूरत नगर निगम के अधिकारियों और पुलिसवालों की मौजूदगी में बुलडोजर आए और उनके घरों को तोड़ दिया. आमतौर पर अवैध निर्माण हटाने का काम नगर निगम का होता है, लेकिन नगर निगम ने साफ मना कर दिया इस कार्रवाई में उनका कोई हाथ नहीं है. वहां के स्थानीय भाजपा विधायक विनू मोराडिया ने भी इस बात को स्वीकार किया इस मामले में कुछ तो गड़बड़ है, क्योंकि जब नगर निगम ने कार्रवाई नहीं की तो इन झुग्गियों को किसने तोड़ा.
याचिकाकर्ता ने पांच पक्षों को बनाया प्रतिवादी
इस मामले में याचिकाकर्ता हुसैन अजीज ने पांच पक्षों को प्रतिवादी बनाया है. जिन्हें प्रतिवादी बनाया गया है, उनमें गुजरात सरकार, सूरत नगर निगम, सूरत पुलिस कमिश्नर, डिप्टी कमिश्नर और स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप शामिल है. याचिकाकर्ता ने कहा कि झुग्गी बस्ती के लोगों के घर तोड़े जा रहे हैं, लेकिन प्रशासन की कोई भी एजेंसी इसकी जिम्मेदारी नहीं ले रही है. इसी के खिलाफ उन्होंने अपने घर को बचाने और इंसाफ के लिए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है.
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