देश में बाल यौन शोषण और मानव तस्करी के खिलाफ एक महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसले में, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि व्यावसायिक यौन शोषण के उद्देश्य से किसी नाबालिग की तस्करी किए जाने पर आरोपियों के खिलाफ POCSO Act के तहत भी मुकदमा चलाया जाएगा। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में बच्चे की कथित सहमति का कोई कानूनी महत्व नहीं है और इसे कानूनन गैर-सहमति वाला अपराध माना जाएगा।

‘सहमति’ का दावा नहीं बनेगा बचाव का आधार

जस्टिस जे.बी. पार्डीवाला और आर. महादेवन की पीठ ने एनजीओ प्रज्वला की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि मानव तस्करी और बाल यौन शोषण के मामलों में पीड़ित नाबालिग की सहमति को बचाव के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता। चाहे उसे बहलाया-फुसलाया गया हो, धमकाया गया हो या उसने परिस्थितियों के दबाव में कोई सहमति जताई हो, कानून की नजर में वह पीड़ित ही मानी जाएगी।

अदालत ने कहा कि जांच और सुनवाई के दौरान ध्यान पीड़ित के व्यवहार पर नहीं, बल्कि आरोपियों की मंशा, भूमिका और अपराध की प्रकृति पर केंद्रित होना चाहिए। यदि किसी नाबालिग को यह जानकारी भी हो कि उसे वेश्यावृत्ति में धकेला जा रहा है, तब भी उसकी स्थिति पीड़ित की ही रहेगी, क्योंकि उसे परिस्थितियों, शोषण और कार्य स्थितियों के बारे में भ्रमित या धोखे में रखा जा सकता है।

संविधान के अनुच्छेद 23 का उल्लेख

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 23 मानव तस्करी पर पूर्ण प्रतिबंध लगाता है। यह संवैधानिक सुरक्षा केवल राज्य के खिलाफ ही नहीं, बल्कि निजी व्यक्तियों और संगठनों के खिलाफ भी समान रूप से लागू होती है।

जांच एजेंसियों को व्यापक दृष्टिकोण अपनाने का निर्देश

अदालत ने जांच अधिकारियों को निर्देश दिया कि ऐसे मामलों को किसी एक कानून तक सीमित न रखा जाए। मामलों की गंभीरता को देखते हुए भारतीय न्याय संहिता (BNS), अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम और POCSO Act सहित सभी प्रासंगिक कानूनी प्रावधानों का समन्वित रूप से उपयोग किया जाए।

कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि POCSO Act के तहत पीड़ित बच्चों के बयान दर्ज करने, मेडिकल परीक्षण और न्यायिक प्रक्रिया को अधिक संवेदनशील, सुरक्षित और बाल-अनुकूल बनाया गया है, जिससे उन्हें न्याय पाने में बेहतर संरक्षण मिलता है।

पुनर्वास को बताया सबसे बड़ा समाधान

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल पीड़ितों को बचाना पर्याप्त नहीं है। वास्तविक सशक्तिकरण तब संभव है जब उन्हें शिक्षा, कौशल विकास, आर्थिक सहायता और सामाजिक पुनर्वास के माध्यम से आत्मनिर्भर बनाया जाए। अदालत के अनुसार, प्रभावी पुनर्वास के अभाव में कई पीड़ित दोबारा शोषण और तस्करी के चक्र में फंसने के लिए मजबूर हो जाते हैं।

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