लखनऊ। उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। चुनाव नजदीक आते ही राम मंदिर और अयोध्या एक बार फिर राजनीति के केंद्र में आ गए हैं। समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव लगातार राम मंदिर को लेकर सवाल उठा रहे हैं। इसके जवाब में भाजपा और उसके समर्थक पूछ रहे हैं कि आखिर ऐसा क्यों है कि जब राम मंदिर की उपलब्धियों की बात होती है तो सपा खामोश रहती है, लेकिन जब मंदिर को लेकर कोई विवाद या नकारात्मक खबर सामने आती है तो अखिलेश यादव सबसे पहले सक्रिय दिखाई देते हैं।
ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर सपा और राम मंदिर के बीच रिश्ता क्या है? इसका जवाब समझने के लिए 35 साल पीछे जाना होगा। क्योंकि यह सिर्फ एक मंदिर की कहानी नहीं है। यह उस राजनीतिक यात्रा की कहानी है जिसके इर्द-गिर्द समाजवादी पार्टी की पूरी राजनीति खड़ी हुई और जिसने उसकी पहचान तय की।
1990: वह घटना जिसने सपा की स्थायी छवि बना दी
साल 1990। देश में राम मंदिर आंदोलन अपने चरम पर था। लाखों कारसेवक अयोध्या की ओर बढ़ रहे थे। उस समय यूपी में जनता दल की सरकार थी और मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव थे। 30 अक्टूबर और 2 नवंबर 1990 को मुलायम सिंह यादव के आदेश पर अयोध्या में कारसेवकों पर पुलिस फायरिंग हुई। कई लोगों की मौत हुई। लेकिन इस घटना से भी ज्यादा चर्चा इस बात की हुई कि मुलायम सिंह यादव ने बाद के वर्षों में कभी इस फैसले पर पछतावा नहीं जताया। उल्टा समय-समय पर उन्होंने कहा कि जो किया गया, वह सही था।
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राम विरोध की राजनीति और सपा का उदय
1992 में बाबरी ढांचा गिरा। देशभर में राम मंदिर आंदोलन को लेकर जबरदस्त भावनात्मक माहौल था। इसी दौरान मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी बनाई। उसी दौर में बसपा और सपा का गठबंधन हुआ और एक नारा पूरे उत्तर प्रदेश में गूंजा- “मिले मुलायम-कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम।
यह नारा राजनीतिक रूप से तो सफल रहा। गठबंधन सत्ता तक पहुंच गया। लेकिन इसी के साथ सपा पर ‘राम विरोधी राजनीति’ का ठप्पा और गहरा होता चला गया। सपा को इस राजनीति का चुनावी लाभ भी मिला। मुस्लिम वोटों का बड़ा हिस्सा सपा के साथ मजबूती से जुड़ता गया और MY (मुस्लिम-यादव) समीकरण उसकी सबसे बड़ी ताकत बन गया।
राम मंदिर आंदोलन चलता रहा, सपा दूरी बनाती रही
1992 के बाद से लेकर 2019 तक राम मंदिर का मुद्दा अदालतों, आंदोलनों और राजनीतिक बहसों में लगातार बना रहा। लेकिन इन लगभग तीन दशकों में सपा ने खुद को कभी राम मंदिर आंदोलन के साथ खड़ा नहीं दिखाया। राम मंदिर निर्माण को लेकर जब भी चर्चा हुई, सपा ने इसे भाजपा की राजनीति बताया। दिलचस्प बात यह है कि सपा के किसी बड़े आंदोलन, चुनावी अभियान या राजनीतिक प्रस्ताव में राम मंदिर कभी केंद्रीय मुद्दा नहीं बना। बल्कि सपा ने अपनी ‘राम विरोधी’ छवि को मजबूती से बनाए रखा।
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सुप्रीम कोर्ट का फैसला, लेकिन उत्साह नहीं
नवंबर 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने राम जन्मभूमि मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया और मंदिर निर्माण का रास्ता साफ हो गया। देशभर में इस फैसले का स्वागत हुआ। लेकिन सपा के भीतर वह उत्साह दिखाई नहीं दिया जो आम हिंदू समाज में दिख रहा था। पार्टी ने फैसले का सम्मान जरूर किया, लेकिन उसके नेताओं के बयान बताते रहे कि वे इस मुद्दे को भाजपा की राजनीतिक सफलता के रूप में देखते हैं, न कि किसी सांस्कृतिक उपलब्धि के रूप में।
मुलायम से भी दो कदम आगे निकले अखिलेश?
मुलायम सिंह यादव के बाद जब पार्टी की कमान पूरी तरह अखिलेश यादव के हाथ में आई तो उम्मीद थी कि सपा अपने पुराने रुख में कुछ बदलाव करेगी। लेकिन अखिलेश ने राम मंदिर के मुद्दे पर मुलायम से भी ज्यादा दूरी बना ली। 22 जनवरी 2024 को जब रामलला की प्राण प्रतिष्ठा हुई तो पूरे देश की नजर अयोध्या पर थी। देश-दुनिया के बड़े संत, उद्योगपति, कलाकार और नेता वहां पहुंचे। अखिलेश यादव को भी निमंत्रण मिला था। लेकिन वह कार्यक्रम में नहीं गए। इसके बाद उन्होंने अलग-अलग मौकों पर कहा कि दर्शन व्यक्तिगत विषय है, कभी कहा कि कार्यक्रम का राजनीतिक इस्तेमाल हो रहा है, तो कभी कहा कि वह बाद में दर्शन करने जाएंगे। लेकिन उन्होंने राम मंदिर को लेकर दूरी ही बनाए रखी।
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विधानसभा में भी दिखा विरोध
राम मंदिर बनने के बाद उत्तर प्रदेश विधानसभा में सभी विधायकों को रामलला दर्शन कराने का प्रस्ताव सामने आया। कई दलों ने इसका स्वागत किया। लेकिन सपा के भीतर इस मुद्दे पर मतभेद खुलकर सामने आए। पार्टी के कुछ विधायक खुलकर राम मंदिर जाने के पक्ष में थे। लेकिन अखिलेश यादव ने कड़े निर्देश दिए थे और कहा था कि उनकी पार्टी के विधायक अयोध्या नहीं जाएंगे। बाद में कई नेताओं ने अलग-अलग मंचों पर यह भी कहा कि पार्टी नेतृत्व का रवैया इस मुद्दे पर सकारात्मक नहीं था। राजनीतिक गलियारों में माना जाता है कि इसी दौर में सपा के भीतर असंतोष की एक नई रेखा खिंचनी शुरू हुई और कई विधायक बागी हुए।
स्वामी प्रसाद मौर्य और विवादित बयान
रामचरितमानस पर टिप्पणी हो या कारसेवकों पर गोली चलाने की घटना का बचाव, स्वामी प्रसाद मौर्य के बयानों ने सपा को कई बार मुश्किल में डाला। लेकिन अखिलेश यादव ने ऐसे बयानों पर कभी वैसी सख्ती नहीं दिखाई जैसी पार्टी दूसरे मामलों में दिखाती है।
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अयोध्या जीत के बाद नया नैरेटिव
2024 में लोकसभा के चुनाव हुए। ये चुनाव राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के कुछ समय बाद ही हुए थे। इस दौरान अयोध्या की सीट सपा के खाते में चली गई। इसके बाद सपा ने इस जीत को लेकर भी एक नैरेटिव बनाया कि राम मंदिर से लोग खुश नहीं हैं और अयोध्या की जीत से सपा ने पूरे देश में एक नैरेटिव गढ़ने की कोशिश की उसके पास ही राम मंदिर या हिंदू पॉलिटिक्स की काट है। इससे अखिलेश यादव ने अपनी मुस्लिम छवि को और मजबूत करने की कोशिश की।
अबतक दर्शन नहीं, इसलिए उठते हैं सवाल
रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के समय अखिलेश यादव ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि वह बाद में परिवार के साथ अयोध्या आकर दर्शन करेंगे। लेकिन इसके बाद काफी समय बीत गया और राजनीतिक विरोधी लगातार यह सवाल उठाते रहे कि वह अयोध्या तो कई बार गए, चुनाव प्रचार भी किया, लेकिन रामलला के दर्शन के लिए नहीं पहुंचे।
इस पर अखिलेश यादव अक्सर कहते हैं कि जब भगवान उन्हें बुलाएंगे, तब वह जरूर जाएंगे। हालांकि उनके विरोधी और कई राजनीतिक विश्लेषक इस जवाब को महज एक राजनीतिक संतुलन साधने की कोशिश मानते हैं। उनका तर्क है कि अगर किसी धार्मिक स्थल पर जाने के लिए केवल “बुलावे” का इंतजार ही आधार है, तो फिर यह सवाल भी उठेगा कि दूसरे धर्मों के धार्मिक स्थलों पर जाने के लिए क्या अलग से बुलावा आता है?
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दरअसल अखिलेश यादव इस मुद्दे पर बेहद सावधानी से कदम रखते हैं। वह ऐसी कोई छवि नहीं बनने देना चाहते, जिससे यह संदेश जाए कि वह राम मंदिर आंदोलन या अयोध्या में बने भव्य राम मंदिर के प्रति खुलकर समर्थन जता रहे हैं। यही वजह है कि वह इस विषय पर अक्सर संतुलित और गोलमोल जवाब देते नजर आते हैं।
सपा की दुविधा क्या है?
माना जाता है कि समाजवादी पार्टी की सबसे बड़ी दुविधा उसका पारंपरिक वोट बैंक है। उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतदाताओं का बड़ा हिस्सा लंबे समय से सपा के साथ जुड़ा रहा है। ऐसे में पार्टी नेतृत्व को लगता है कि राम मंदिर के समर्थन में कोई भी खुला और आक्रामक रुख उसके स्थापित सामाजिक समीकरणों को प्रभावित कर सकता है।

