बेगूसराय। शहर में गंगा को प्रदूषण मुक्त करने और आधुनिक ड्रेनेज सिस्टम का सपना भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया है। जो परियोजना 2008 में 64 करोड़ की लागत से शुरू हुई थी, वह 17 साल बाद 237 करोड़ खर्च होने के बावजूद अधूरी है। अब यह मामला पटना हाईकोर्ट पहुंच गया है, जहां अधिवक्ता अमरेंद्र कुमार अमर ने जनहित याचिका (PIL) दाखिल कर अधिकारियों और कंपनियों की मिलीभगत पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
अधूरे काम का उद्घाटन
याचिका में आरोप लगाया गया है कि तोशिबा और केवडिया जैसी कंपनियों ने अधिकारियों के साथ मिलकर अधूरे प्रोजेक्ट को ‘पूर्ण’ घोषित कर दिया। हद तो तब हो गई जब 20 जून 2025 को प्रधानमंत्री से इसका उद्घाटन भी करा लिया गया। हकीकत यह है कि आज भी शहर की गलियां खुदी हुई हैं और सीवरेज नेटवर्क का कहीं पता नहीं है। PIL में सवाल किया गया है कि क्या प्रधानमंत्री जैसे गरिमामय पद को गलत जानकारी देकर गुमराह किया गया?
घोटाले की क्रोनोलॉजी: बढ़ती लागत
2008 में तत्कालीन उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी ने इसका शिलान्यास किया था। पहली कंपनी ‘ट्रिटेक इंडिया’ पैसा लेकर फरार हो गई। 2015-16 में बजट बढ़ाकर तोशिबा और केवडिया कंस्ट्रक्शन को काम मिला। 5 फरवरी 2022 की डेडलाइन बीतने के बाद इसे अक्टूबर 2024 किया गया, लेकिन 2026 की शुरुआत तक काम अधूरा है।
कार्रवाई की मांग और अदालती हस्तक्षेप
अधिवक्ता का कहना है कि 17 मिलियन लीटर प्रतिदिन (MLD) क्षमता वाला प्लांट तो बन गया है, लेकिन पाइपलाइन के अभाव में यह ‘सफेद हाथी’ साबित हो रहा है। विधानसभा में भी यह मुद्दा गूंजा, जिसके बाद सरकार ने कंपनियों पर जुर्माना और ब्लैकलिस्टिंग की बात कही है। याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट से उच्च स्तरीय जांच और दोषी अधिकारियों व एजेंसियों से सरकारी धन की वसूली की मांग की है।
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