Chaitra Navratri 2026. भगवती जगदम्बा की आराधना के पर्व नवरात्र की शुरुआत हो चुकी है. आज चैत्र नवरात्र और नव संवत्सर 2083 (nav samvatsar 2083) का पहला दिन है. नवरात्र के 9 दिनों में मां के विभिन्न स्वरूपों की विशेष आराधना की जाती है. ये 9 दिन शक्ति उपासना के होते हैं. जिसमें श्रद्धालु व्रत रहकर पूजा-अनुष्ठान करते हैं. देवी मंदिरों में भक्तों का तांता लगा रहता है. भारत देश में कई प्राचीन और पौराणिक मान्यताओं वाले मंदिर हैं. जिनकी महिमा अपार है. हर एक देवी मंदिर की एक कथा है. आज हम आपको विश्व की सबसे प्राचीन नगरी काशी में स्थित मां विशालाक्षी मंदिर (Maa Vishalakshi Temple) के बारे में बता रहे हैं.

उत्तर प्रदेश का एक ऐसा ‘शक्ति स्थल’ जहां विराजित हैं मां विशालाक्षी (Maa Vishalakshi). बाबा विश्वनाथ मंदिर के निकट ही मां विशालाक्षी का मंदिर है. ये मंदिर माता के 51 शक्तिपीठों में से एक है. यहां माता के दाहिने कान का कुंडल गिरा था. हालांकि कुछ मान्यताओं के अनुसार यहां माता की आंख गिरी थी. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, मां विशालाक्षी यहां बाबा विश्वनाथ की अर्धांगिनी के रूप में विराजित है. बाबा विश्वनाथ यहीं पर प्रतिदिन रात्रि शयन करते है. काशी की टेढ़ी मेढ़ी गलियों के बीच देवी का ये शक्ति पीठ है, जहां श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है.

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जगद्गुरु आद्य शंकराचार्य ने की थी देवी की प्रतिष्ठा

मां विशालाक्षी मंदिर में भगवती के दो विग्रह हैं. पुजारियों के मुताबिक वर्तमान में जिस प्रतिमा के दर्शन होते हैं, उसके ठीक पीछे मां आदि शक्ति की प्रतिमा है. उनके आगे श्रीयंत्र था. पीछे जो माता की प्रतिमा है, उनका तेज बहुत अधिक होने के कारण उन्हें सामने से कोई देख नहीं पाता था. तब जगद्गुरु आदि शंकराचार्य जी ने श्रीयंत्र के उपर देवी की दूसरी प्रतिमा स्थापित की. विशालाक्षी मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार के ऊपर एक गोपुरम है. मंदिर में शिव लिंगम, नाग (दिव्य नाग) और श्री गणेश जी का विग्रह भी स्थापित है. गर्भगृह के पीछे भगवद्पाद शिवावतार जगद्गुरु आदि शंकराचार्य जी की एक संगमरमर की मूर्ति भी है. जब आदि शंकराचार्य मंदिर में आए, तब उन्होंने यहां एक श्रीयंत्रम भी स्थापित किया जिसकी पूजा की जाती है. इस श्रीयंत्रम की कुमकुम अर्चना बहुत शुभ मानी जाती है.

ऋषि वेद व्यास को माता ने कराया था भोजन

मान्यता के अनुसार यहां पर देवी के गृहिणी स्वरूप की भी पूजा की जाती है. स्कंद पुराण के अनुसार एक बार ऋषि वेद व्यास वाराणसी में भूख से व्याकुल होकर घूम रहे थे, लेकिन उन्हें किसी ने भोजन नहीं दिया. अंत में मां विशालाक्षी एक गृहिणी के रूप में प्रकट हुईं. फिर उन्होंने वेद व्यास को भोजन कराया. मां विशालाक्षी की ये भूमिका देवी अन्नपूर्णा के समान है. काशी में पराम्बा भगवती अन्नपूर्णा रूप में ही सबका पालन-पोषण करतीं हैं. वहीं बाबा विश्वनाथ भक्तों के तारक मंत्र देकर मुक्ति प्रदान करते हैं.