दिल्ली की तीस हजारी स्थित पॉक्सो अदालत ने आठ वर्षीय मासूम बच्ची से दुष्कर्म के मामले में 72 वर्षीय आरोपी वीर भान को 20 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। अदालत ने इसके साथ ही आरोपी पर 50,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया। मामले की सुनवाई अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश बबिता पुनिया की अदालत में हुई, जिसमें आरोपी को पॉक्सो अधिनियम की धारा 6 और बीएनएस की धारा 65(2) व 351(2) के तहत दोषी ठहराया गया। अदालत ने सजा सुनाते हुए कहा “यह केवल अपराध नहीं है, बल्कि बचपन और राष्ट्र के भविष्य पर हमला है।”

अदालत ने टिप्पणी की “यह बेहद डरावना है कि हम ऐसे समाज में रह रहे हैं, जहां बच्चे सुरक्षित नहीं हैं। वीर भान जैसे लोग मासूम बच्चों पर गिद्ध की तरह नजर रखते हैं।” पीड़िता के पुनर्वास और भविष्य को ध्यान में रखते हुए अदालत ने आदेश दिया पीड़िता को 13.50 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाएगा। शिक्षा निदेशालय को निर्देश दिया गया है कि वह पीड़िता की 12वीं कक्षा तक की पढ़ाई और उसके बाद व्यावसायिक प्रशिक्षण बिना किसी बाधा के सुनिश्चित करे।

CCTV फुटेज को माना अहम

निहाल विहार थानाक्षेत्र में 23 दिसंबर 2025 को आठ वर्षीय मासूम बच्ची के साथ घिनौना यौन अपराध हुआ। पुलिस के अनुसार, पीड़िता की मां का देहांत हो चुका है और पिता ने परिवार छोड़ दिया था, इसलिए बच्ची अपनी मौसी के पास रहती थी। घटना वाले दिन बच्ची टॉफी खरीदने के लिए आरोपी वीर भान की दुकान पर गई। आरोपी ने उसे दुकान के अंदर ले जाकर यौन उत्पीड़न किया और किसी को बताने पर जान से मारने की धमकी दी। अपराध का खुलासा तब हुआ जब आरोपी की बहू ने दुकान में संदिग्ध गतिविधियां देखीं और बच्ची को वहां से डांटकर सुरक्षित बाहर भेजा।

इस घटना का खुलासा एक पड़ोसी महिला के जरिए हुआ, जिसने जानकारी बच्ची की मौसी तक पहुँचाई, जिसके बाद पुलिस में प्राथमिकी दर्ज की गई। शुरुआती जांच मामले में पहली आईओ एसआई पूजा चंदेल ने की। घटना के लगभग एक माह के भीतर, 29 जनवरी 2026 को दूसरी आईओ एसआई मनीषा ने अदालत में आरोपपत्र दाखिल किया। अदालत ने पुलिस की जांच और सीसीटीवी फुटेज जैसे तकनीकी साक्ष्यों को आरोपी को दोषी ठहराने और सजा दिलाने में निर्णायक बताया।

दोषी ने तोड़ा भरोसा

बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि आरोपी 72 वर्ष का है और यह उसका पहला अपराध है, इसलिए सजा में नरमी बरती जानी चाहिए। लेकिन अदालत ने स्पष्ट किया पीड़िता और आरोपी के बीच 64 साल का अंतर है। बच्ची आरोपी को ‘दादा’ कहकर बुलाती थी, जो भरोसे और पवित्रता का प्रतीक है। आरोपी ने इस पवित्र रिश्ते और भरोसे का दुरुपयोग किया।

अदालत ने कहा “बुजुर्गों से बच्चों की सुरक्षा की उम्मीद की जाती है, लेकिन ऐसी घटनाएं समाज की मजबूत नींव को हिला देती हैं।” लोक अभियोजक ने जिरह के दौरान कहा कि वृद्धावस्था सहानुभूति जरूर जगाती है, लेकिन समाज में इस तरह की आपराधिक मंशा रखने वालों को संदेश देने के लिए आरोपी को कड़ी सजा मिलनी चाहिए।

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