गोविंद पटेल, कुशीनगर। सरकार भले ही महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) का नाम बदलकर “विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन ग्रामीण (VB G RAM G)” रखकर नई तस्वीर पेश करने की कोशिश कर रही हो, लेकिन जमीनी सच्चाई आज भी पुरानी ही नजर आ रही है। कुशीनगर में मनरेगा के तहत काम करने वाली महिला मेटों का सब्र अब जवाब देने लगा है। रोजगार की गारंटी देने वाली इस योजना में खुद निगरानी करने वाली महिलाएं ही आज रोजगार और सम्मान के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं।

महिला मेटों का जोरदार प्रदर्शन

जिला मुख्यालय पर सैकड़ों की संख्या में पहुंची महिला मेटों ने जोरदार प्रदर्शन किया और मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपकर अपनी पीड़ा जाहिर की। उनका साफ कहना है कि वे मजदूरों की हाजिरी से लेकर पूरे काम की निगरानी तक अहम जिम्मेदारी निभाती हैं, लेकिन इसके बावजूद उन्हें न तो समय पर मानदेय मिलता है और न ही कोई स्थायी आर्थिक सुरक्षा।

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महीनों तक भुगतान नहीं होता

महिला मेटों का आरोप है कि महीनों तक भुगतान नहीं होता, जिससे परिवार चलाना मुश्किल हो गया है। ऐसे में “रोजगार की गारंटी” का दावा उनके लिए सिर्फ कागजी साबित हो रहा है। तकनीकी बोझ भी कम नहीं है। NMMS App के जरिए फोटो अपलोड और ऑनलाइन मॉनिटरिंग की जिम्मेदारी तो दे दी गई, लेकिन न तो स्मार्टफोन दिया गया और न ही रिचार्ज की सुविधा।

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ऐसे में महिलाएं अपने निजी संसाधनों से काम करने को मजबूर हैं। महिला मेटों ने हर महीने तय मानदेय, बीमा सुविधा और नियुक्ति पत्र देने की मांग उठाई है, ताकि उनके काम को कानूनी मान्यता और सुरक्षा मिल सके। सबसे बड़ा सवाल यही है, क्या सिर्फ नाम बदलने से योजनाओं की सूरत बदल जाएगी? या फिर मनरेगा की तरह ही “VB G RAM G” भी कागजों में ही सीमित रह जाएगी? फिलहाल कुशीनगर की महिला मेटों की आवाज एक बार फिर व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा कर रही है… कि आखिर कब मिलेगा उन्हें उनका हक?