अभय मिश्रा, मऊगंज। न्याय की कुर्सी पर बैठा जज जब किसी मामले का फैसला सुनाता है, तो उसकी सबसे बड़ी बुनियाद होती है- ‘गवाह’। लेकिन क्या हो जब ये गवाह पुलिस की जेब में रखे ‘कठपुतली’ बन जाएं ? मध्य प्रदेश के मऊगंज जिले से एक ऐसा ही खुलासा हुआ है जिसने खाकी और कानून की निष्पक्षता पर कालिख पोत दी है। हनुमना थाने में एक ऐसा ‘सुपरमैन’ ड्राइवर मिला है जो पुलिस की गाड़ी चलाने के साथ-साथ गवाही देने की मशीन बन चुका है। सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियों के बावजूद मऊगंज पुलिस ‘पॉकेट गवाहों’ के भरोसे केस फाइलें भर रही है। आखिर क्या है यह ‘गवाह सिंडिकेट’?

हनुमना पुलिस ने कानून के हाथ-पैर ही बांध दिए हैं। दरअसल, इंदौर के चंदन नगर थाना, मऊगंज जिले का नईगड़ी थाने से शुरू हुआ ‘पॉकेट गवाह’ का कलंक अब मऊगंज की गलियों में सरेआम घूम रहा है। हनुमना थाने में तैनात थाना प्रभारी अनिल काकडे का निजी वाहन चालक, राजेश साकेत, महज एक ड्राइवर नहीं है, बल्कि वह पुलिस का ‘ऑलराउंडर गवाह’ है। 8 महीनों में 48 से ज्यादा मामलों में इसकी गवाही दर्ज है।

हैरानी की इंतहा

28 मार्च 2026 की तारीख को नोट कर लीजिए। इस एक ही दिन में राजेश साकेत और सूर्यमणि मिश्रा नाम के इन दो किरदारों ने हनुमना थाना, हाटा चौकी और पिपराही चौकी के 6 अलग-अलग मामलों में गवाही दे डाली। 50 किलोमीटर के दायरे में फैले इन इलाकों में ये गवाह पुलिस की जीप से भी तेज दौड़ते हैं। ऐसा लगता है जैसे अपराध होने से पहले ही ये ‘फिक्स गवाह’ वहां मौजूद होते हैं।

आंकड़े चौंका देंगे

सूर्यमणि मिश्रा, राजेश साकेत और पुष्पराज द्विवेदी इन तीन चेहरों ने मिलकर 314 से ज्यादा मामलों में गवाही दी है। गवाह सूर्यमणि मिश्रा के नाम 2020 से अब तक 264 मामले दर्ज हैं। लूट हो, डकैती हो, मारपीट हो या गांजा तस्करी-पुलिस को हर जगह यही चेहरे मिलते हैं। लेकिन जब कैमरे पर सवाल पूछा गया, तो जवाब मिला कि “हमें तो कुछ पता ही नहीं!” ड्राइवर राजेश कहता है कि उसे 9000 रुपये मिलते हैं, लेकिन सवाल ये है कि सरकारी गाड़ी चलाने के लिए उसे रखा किसने और यह ‘मानदेय’ किसकी जेब से जा रहा है?

थाना प्रभारी का इतिहास दागदार

इस पूरे खेल के मास्टरमाइंड माने जा रहे थाना प्रभारी अनिल काकडे का इतिहास खुद दागदार है। मऊगंज में पदस्थापना के दौरान इन्होंने ‘हत्या’ की फाइल को ‘आत्महत्या’ बताकर रफा-दफा करने की कोशिश की थी। मेडिकल रिपोर्ट ने पोल खोली तो विभागीय जांच बैठ गई। लेकिन सिस्टम की मेहरबानी देखिए, जांच के बीच भी इन्हें थाने की कमान सौंप दी गई। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने इन ‘फिक्स गवाहों’ को न्याय व्यवस्था के लिए कैंसर बताया है। एमपी हाई कोर्ट के निर्देशन में 7 सदस्यीय हाई पावर कमेटी भी बनी है, लेकिन मऊगंज पुलिस के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही।

प्रभारी मंत्री का घिसा-पिटा जवाब

प्रभारी मंत्री लखन पटेल से जब इस सिंडिकेट पर सवाल हुआ, तो उनका घिसा-पिटा जवाब आया- “दिखवाते हैं।” लेकिन सवाल बड़ा है कि क्या मऊगंज में पुलिस सिर्फ कागजों का पेट भरने के लिए केस बना रही है? अगर गवाह ही ‘फिक्स’ हैं, तो क्या असली मुजरिम कभी जेल जाएंगे? और सबसे बड़ा सवाल कि जिस थाना प्रभारी पर खुद जांच चल रही हो, उसे ‘गवाहों की ये फैक्ट्री’ चलाने की छूट किसने दी? जवाब का इंतजार मऊगंज की जनता और कानून को भी है।

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