दिल्ली हाई कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि बार काउंसिल ऑफ दिल्ली (BCD) के चुनाव में सभी सीटों पर आरक्षण लागू करना संविधान के तहत संभव नहीं है। वकीलों ने मांग की थी कि 6 सीटें उन वकीलों के लिए आरक्षित की जाएँ जिनके पास 10 साल से कम का अनुभव है। चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तुषार राव गेडेला की पीठ ने यह अपील खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि इस तरह का कदम सभी पदों पर 100 फीसदी आरक्षण लागू करने जैसा होगा, जिसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। 

BCD चुनाव में आरक्षण नीति संवैधानिक और नियमों के अनुरूप ही लागू होगी, और वकीलों के अनुभव के आधार पर ही सीटें आवंटित होंगी। बता दें कि BCD में 23 सदस्य चुने जाते हैं। अनुभवी वकीलों के लिए आरक्षित 12 सीटें (10 साल से अधिक अनुभव वाले वकील) महिला वकीलों के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा आरक्षित 5 सीटें, जूनियर वकीलों ने शेष 6 सीटों के लिए आरक्षण की मांग की थी (10 साल से कम अनुभव वाले वकील) चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तुषार राव गेडेला की पीठ ने जूनियर वकीलों की मांग खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि सभी पदों पर आरक्षण लागू करना संवैधानिक रूप से स्वीकार्य नहीं है।

क्या कहा पीठ ने आदेश में?

चीफ जस्टिस उपाध्याय ने कहा, “किसी भी स्थिति में अपीलकर्ता द्वारा मांगी गई राहत नहीं दी जा सकती, क्योंकि BCD के सभी पदों के लिए पूरी तरह से आरक्षण की अनुमति नहीं है। एडवोकेट्स एक्ट की धारा 3(2)(b) के अनुसार, 10 साल से अधिक अनुभव वाले वकीलों के लिए 50% आरक्षण और सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्देशित महिला वकीलों के लिए 30% आरक्षण का मतलब यह नहीं कि शेष 20% पद जूनियर वकीलों के लिए आरक्षित हैं। इस तरह की व्याख्या से सभी पदों पर पूर्ण आरक्षण लागू हो जाएगा, जो एडवोकेट्स एक्ट के प्रावधानों के विपरीत है।

संविधान में 100 फीसदी आरक्षण की अनुमति नहीं

 दो जजों की पीठ ने एकल न्यायाधीश के फैसले से सहमति जताई।   कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अपीलकर्ता के पास 10 साल से कम अनुभव वाले वकीलों के लिए बाकी सीटें आरक्षित करने का कोई निहित अधिकार नहीं है।  कोर्ट ने कहा कि एडवोकेट्स एक्ट या भारतीय संविधान के दायरे में सभी पदों के लिए 100% आरक्षण की अनुमति नहीं है।

अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन

बार एंड बेंच के अनुसार, जूनियर वकील रमेश चंद्र सिंह ने 2022 में बार काउंसिल ऑफ दिल्ली (BCD) में अपना पंजीकरण कराया और फरवरी 2026 के चुनावों में हिस्सा लिया। BCD के 23 सदस्यों के चुनाव अधिसूचना के अनुसार, 12 सीटें उन वकीलों के लिए आरक्षित थीं जिनके पास कम से कम 10 साल का अनुभव है। 5 सीटें महिला उम्मीदवारों के लिए आरक्षित थीं। रमेश चंद्र सिंह ने दावा किया कि शेष 6 सीटें उन वकीलों के लिए आरक्षित होनी चाहिए जिन्हें 10 साल से कम अनुभव है। उनका तर्क था कि जूनियर वकीलों के लिए सीटों का आरक्षण न होना, भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत उनके समानता के अधिकार का उल्लंघन करता है।

एकल पीठ ने भी दिया था झटका

एकल न्यायाधीश का फैसला उन्होंने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि 10 साल से अधिक अनुभव वाले वकीलों और महिला वकीलों के लिए आरक्षण होने का मतलब यह नहीं कि 10 साल से कम अनुभव वाले वकीलों को कोई निहित अधिकार प्राप्त है।  चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय की अध्यक्षता वाली दो जजों की पीठ ने भी एकल न्यायाधीश के आदेश को सही ठहराया। याचिकाकर्ता वकील रमेश चंद्र सिंह खुद अदालत में पेश हुए थे, लेकिन उनकी मांग खारिज कर दी गई।

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