Supreme Court Hearing On UGC New Rules: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी यूजीसी (UGC) के नए नियमों को लेकर देश में बवाल मचा हुआ। सवर्ण समाज में इन नियमों को लेकर लगातार प्रदर्शन कर रहा है। नए नियमों के खिलाफ दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और बिहार सहित कई राज्यों में छात्रों ने प्रदर्शन किए हैं। UGC के नए नियमों के खिलाफ देश में मचे बवाल के बीच सुप्रीम कोर्ट में आज मामले की सुनवाई होगी। यूजीसी के नए भेदभाव विरोधी नियमों को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट आज सुनवाई करेगा। यह मामला मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत (Surya Kant Chief Justice of India) की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने लिस्ट किया गया है।
याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि नए नियम सामान्य वर्ग के छात्रों के साथ भेदभाव करते हैं और इनके दुरुपयोग की आशंका है। नियमों के तहत उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता समितियों का गठन अनिवार्य किया गया है, जिनमें ओबीसी, एससी, एसटी, महिलाओं और दिव्यांगों का प्रतिनिधित्व जरूरी होगा, जबकि सामान्य वर्ग को संभावित पीड़ित के रूप में शामिल नहीं किया गया है।

इधर नए नियमों के खिलाफ दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और बिहार सहित कई राज्यों में छात्रों ने प्रदर्शन किए हैं। इस बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने भरोसा दिलाया है कि नए नियमों के तहत किसी के साथ भेदभाव नहीं होगा और इनका गलत इस्तेमाल नहीं होने दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि सरकार और संबंधित संस्थानों की जिम्मेदारी होगी कि कानून का दुरुपयोग न हो।
क्या कहते हैं यूजीसी के नए नियम?
बता दें कि उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव को रोकने के लिए 13 जनवरी, 2026 को प्रकाशित यूजीसी के नियमों में विशेष समितियों, हेल्पलाइन और निगरानी दलों की स्थापना अनिवार्य की है। इस नियम का उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC), आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS), महिलाओं और दिव्यांग छात्रों, शिक्षकों व कर्मचारियों के साथ होने वाले भेदभाव को समाप्त करना बताया गया है। इन नियमों के तहत हर विश्वविद्यालय और कॉलेज में 9 सदस्यों वाली एक समानता समिति यानी इक्विटी कमेटी गठित करने का प्रावधान किया गया है। इस समिति में संस्थान प्रमुख, तीन प्रोफेसर, एक कर्मचारी, दो सामान्य नागरिक, दो विशेष रूप से आमंत्रित छात्र और एक को-ऑर्डिनेटर शामिल होंगे. नियमों के अनुसार इस समिति की कम से कम पांच सीटें अनिवार्य रूप से SC, ST, OBC, दिव्यांगजन और महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। यहीं से विवाद की शुरुआत हुई।

सवर्ण समाज की आपत्ति क्या है
नए नियमों का विरोध कर रहे लोगों का कहना है कि समानता समिति में सामान्य वर्ग यानी जनरल कैटेगरी के लिए कोई अनिवार्य प्रतिनिधित्व तय नहीं किया गया है। उनका तर्क है कि जब समिति भेदभाव की शिकायतों की जांच करेगी, तो सामान्य वर्ग के छात्रों और शिक्षकों को बिना पर्याप्त प्रतिनिधित्व के एकतरफा कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है। आलोचकों का यह भी कहना है कि नियम इस धारणा पर आधारित लगते हैं कि एक वर्ग हमेशा शोषित है और दूसरा वर्ग हमेशा शोषक। इससे शिक्षा परिसरों में अविश्वास का माहौल बन सकता है. सवर्ण समाज के कई संगठनों ने आशंका जताई है कि झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों के जरिए सामान्य वर्ग के छात्रों और शिक्षकों को परेशान किया जा सकता है।

UGC का पक्ष
वहीं विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का कहना है कि ये नियम उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता और समावेशन की भावना को मजबूत करने के लिए लाए गए हैं। आयोग का तर्क है कि बीते कुछ वर्षों में जातिगत भेदभाव से जुड़ी शिकायतों में लगातार बढ़ोतरी हुई है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। UGC की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2019-20 में भेदभाव से जुड़ी 173 शिकायतें दर्ज की गई थीं, जो 2023-24 में बढ़कर 378 हो गईं। पांच वर्षों में कुल 1160 शिकायतें सामने आई हैं, यानी करीब 118 प्रतिशत की वृद्धि. आयोग का कहना है कि ये आंकड़े यह दर्शाते हैं कि उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव एक गंभीर समस्या है और इसे रोकने के लिए मजबूत तंत्र की जरूरत है।
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