आखिर होली के दिन क्यों जीवित हुए थे कामदेव? जानिये कहानी...

फाल्गुन मास की पूर्णिमा पर मनाई जाने वाली होली केवल रंगों और उमंग का त्योहार ही नहीं है

मान्यता है कि इसी दिन प्रेम के देवता कामदेव को पुनर्जीवन का वरदान मिला था. आइए जानते हैं

पुराणों के अनुसार, असुर तारकासुर ने कठोर तप करके ऐसा वरदान प्राप्त कर लिया था कि उसका वध केवल भगवान शिव के पुत्र के हाथों ही संभव होगा.

लेकिन उस समय भगवान शिव माता सती के देह त्याग के बाद गहरी तपस्या में लीन थे. ऐसे में देवताओं के सामने बड़ी समस्या खड़ी हो गई.

देवताओं के आग्रह पर प्रेम के देवता कामदेव ने अपनी शक्ति का प्रयोग करने का निश्चय किया. उन्होंने भगवान शिव पर पुष्प बाण चलाया.

जैसे ही बाण का प्रभाव पड़ा, शिव की समाधि भंग हो गई. समाधि भंग होते ही भगवान शिव अत्यंत क्रोधित हो उठे. उन्होंने अपना तीसरा नेत्र खोला, जिसकी ज्वाला से कामदेव तत्काल भस्म हो गए.

कामदेव का शरीर नष्ट हो गया और वे केवल राख में बदल गए.

मान्यता है कि जिस दिन कामदेव भस्म हुए, उसी दिन से होलाष्टक की शुरुआत मानी जाती है. इसके बाद रति ने कठोर तपस्या की और भगवान शिव को प्रसन्न किया.

रति की तपस्या और पार्वती के अनुरोध से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने फाल्गुन पूर्णिमा के दिन कामदेव को पुनर्जीवित होने का वरदान दिया.