पटना। बिहार में साल 2006 से 2015 के बीच हुई नियोजित शिक्षक बहाली में बड़े पैमाने पर हुए फर्जीवाड़े का खुलासा हुआ है। निगरानी अन्वेषण ब्यूरो की जांच में अब तक 2953 शिक्षक दोषी पाए गए हैं, जिन्होंने फर्जी डिग्री के आधार पर सरकारी नौकरी हथियाई। अब शिक्षा विभाग इन जालसाज शिक्षकों की सेवा समाप्त करने के साथ-साथ उनसे अब तक वेतन के रूप में लिए गए लगभग 1400 करोड़ रुपये वसूलने और उन्हें जेल भेजने की तैयारी कर रहा है।

​जांच का दायरा और प्रमुख खुलासे

​पटना हाईकोर्ट के आदेश पर 2015 से शुरू हुई यह जांच फरवरी 2026 तक चली, जिसमें करीब 8 लाख प्रमाणपत्रों का सत्यापन किया गया। जांच में पाया गया कि बिहार का कोई भी जिला इस भ्रष्टाचार से अछूता नहीं है। अब तक कुल 1748 एफआईआर दर्ज की जा चुकी हैं।

  • ​नालंदा रहा टॉप पर: फर्जीवाड़े के मामले में नालंदा जिला सबसे आगे है, जहां 165 मामले दर्ज हुए। इसके बाद मधुबनी (145) और पूर्णिया (95) का नंबर आता है।
  • ​न्यूनतम मामले: सबसे कम फर्जीवाड़ा अररिया (04) और सीवान (06) जिलों में देखने को मिला।

​जालसाजी के तरीके

  • ​निगरानी ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार, शिक्षकों ने नौकरी पाने के लिए कई हथकंडे अपनाए:
  • ​गैर-मान्यता प्राप्त और फर्जी निजी विश्वविद्यालयों की डिग्रियों का उपयोग।
  • ​दूसरे अभ्यर्थियों के रोल नंबर और नाम पर अपनी फोटो चिपकाकर दस्तावेज पेश करना।
  • ​एक ही डिग्री के आधार पर अलग-अलग जिलों में एक साथ नौकरी करना।
  • ​डुप्लीकेट अंकपत्रों का सहारा लेना।

​सख्त कार्रवाई की तैयारी

​निगरानी विभाग के डीजी जितेंद्र सिंह गंगवार के नेतृत्व में विशेष टीमें अभी भी उन संस्थानों की जांच कर रही हैं, जिन्होंने जानकारी साझा नहीं की है। विभाग ने स्पष्ट कर दिया है कि दोषी पाए गए शिक्षकों को न केवल पद से हटाया जाएगा, बल्कि उनके द्वारा डकारे गए सार्वजनिक धन की पाई-पाई वसूल की जाएगी। 2022 में सबसे अधिक 445 केस दर्ज किए गए थे, जो यह दर्शाता है कि जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, परतें और खुलती जा रही हैं।