नई दिल्ली। निजी स्कूलों की फीस नियंत्रण को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट में स्कूल प्रबंधन ने दिल्ली सरकार के 2025 के नए फीस नियमों को अदालत में चुनौती दी है। उनका कहना है कि ये नियम उनके प्रशासनिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं। वहीं, दिल्ली सरकार ने अदालत में दलील दी है कि यह कानून शिक्षा के बढ़ते व्यवसायीकरण और मुनाफाखोरी पर रोक लगाने के लिए लाया गया है, ताकि अभिभावकों पर अनावश्यक आर्थिक बोझ न पड़े। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने फिलहाल नई फीस रेगुलेटरी कमेटी के गठन पर रोक लगा दी है। साथ ही अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि स्कूल पुराने सत्र के अनुसार ही फीस वसूलें और किसी तरह की मनमानी बढ़ोतरी न करें। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि यदि कोई स्कूल आदेशों का उल्लंघन करता है, तो दिल्ली सरकार उसके खिलाफ अवमानना की कार्रवाई शुरू कर सकती है।

मुख्य न्यायाधीश देवेन्द्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की पीठ ने संकेत दिया है कि वह इस मामले को लंबा खींचने के बजाय एक ही बार में निपटाना चाहती है। अदालत ने याचिका को शनिवार को विस्तृत सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया है, ताकि सभी पक्षों की दलीलें सुनकर स्पष्ट फैसला लिया जा सके।

सुनवाई के दौरान दिल्ली सरकार के वकील ने कोर्ट को बताया कि मामला बेहद गंभीर है, क्योंकि कुछ निजी स्कूल फीस जमा न करने पर छात्रों का नाम काट रहे हैं। इस पर पीठ ने कहा कि अदालत पहले ही आगामी अकादमिक सत्र के लिए स्कूल-स्तरीय फीस रेगुलेशन कमेटी के गठन के आदेश को फिलहाल टाल चुकी है। कोर्ट ने यह भी दोहराया कि जब तक अंतिम फैसला नहीं आता, तब तक स्कूलों को पुराने सत्र के अनुसार ही फीस वसूलनी होगी। किसी भी तरह की मनमानी या आदेशों की अवहेलना पर सख्त कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई है।

मुख्य न्यायाधीश देवेन्द्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की पीठ ने संकेत दिया है कि वह इस मामले को लंबा खींचने के बजाय एक ही बार में निपटाना चाहती है। अदालत ने याचिका को शनिवार को विस्तृत सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया है, ताकि सभी पक्षों की दलीलें सुनकर स्पष्ट फैसला लिया जा सके।

सुनवाई के दौरान दिल्ली सरकार के वकील ने कोर्ट को बताया कि मामला बेहद गंभीर है, क्योंकि कुछ निजी स्कूल फीस जमा न करने पर छात्रों का नाम काट रहे हैं। इस पर पीठ ने कहा कि अदालत पहले ही आगामी अकादमिक सत्र के लिए स्कूल-स्तरीय फीस रेगुलेशन कमेटी के गठन के आदेश को फिलहाल टाल चुकी है। कोर्ट ने यह भी दोहराया कि जब तक अंतिम फैसला नहीं आता, तब तक स्कूलों को पुराने सत्र के अनुसार ही फीस वसूलनी होगी। किसी भी तरह की मनमानी या आदेशों की अवहेलना पर सख्त कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई है।

बिना सोचे-समझे लागू किया कानून

अधिवक्ता कमल गुप्ता द्वारा दायर ‘एक्शन कमेटी अनएडेड रिकॉग्नाइज्ड प्राइवेट स्कूल्स’ की याचिका में कहा गया है कि यह कानून निजी स्कूलों के प्रबंधन के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि दिल्ली सरकार ने 2025 के फीस नियंत्रण नियमों को बिना पर्याप्त विचार-विमर्श के लागू कर दिया। स्कूलों का कहना है कि इससे उनकी प्रशासनिक स्वतंत्रता प्रभावित हो रही है और वे अपने संस्थान के संचालन से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले लेने में बाधित हो रहे हैं।

दिल्ली सरकार की क्या दलील?

सरकार ने स्पष्ट कहा है कि शिक्षा संस्थान चलाने का अधिकार किसी भी तरह से मुनाफा कमाने या मनमाना प्रवेश शुल्क लेने का अधिकार नहीं देता। सरकार ने अदालत में दलील दी कि यह अधिनियम राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप बनाया गया है, जिसका उद्देश्य शिक्षा के बढ़ते व्यावसायिकरण और मुनाफाखोरी पर रोक लगाना है। सरकार का कहना है कि इस कानून के जरिए अभिभावकों को राहत देना और शिक्षा को अधिक पारदर्शी व सुलभ बनाना लक्ष्य है।

वहीं, निजी स्कूलों की ओर से दायर याचिकाओं में इस कानून को मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताया गया है। स्कूलों का कहना है कि इससे उनके प्रशासनिक अधिकार प्रभावित होते हैं और संस्थान चलाने की स्वतंत्रता सीमित होती है। इस बीच, 28 फरवरी को दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अहम अंतरिम आदेश में आगामी अकादमिक सत्र के लिए स्कूल-स्तरीय फीस रेगुलेशन कमेटी बनाने के दिल्ली सरकार के निर्देश पर रोक लगा दी थी। साथ ही, स्कूलों को पुराने सत्र के अनुसार ही फीस वसूलने के निर्देश दिए गए थे।

स्कूल-लेवल फीस रेगुलेशन कमेटी पर लगाई रोक

अदालत ने स्पष्ट किया कि स्कूल-लेवल फीस रेगुलेशन कमेटी (SLFRC) के गठन के आदेश को फिलहाल लागू नहीं किया जाएगा।हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि आगामी अकादमिक सत्र 2026-2027 के लिए निजी स्कूल वही फीस वसूल सकते हैं, जो उन्होंने पिछले सत्र में ली थी। यानी किसी भी तरह की नई फीस संरचना या बढ़ोतरी पर फिलहाल रोक बनी रहेगी। यह आदेश अभिभावकों के लिए राहत भरा माना जा रहा है, क्योंकि इससे अचानक फीस बढ़ोतरी पर अंकुश लगा है। वहीं, स्कूल प्रबंधन के लिए यह एक अंतरिम व्यवस्था है, जब तक कि अदालत इस मामले में अंतिम फैसला नहीं सुना देती।

SLFRC फ्रेमवर्क में क्या है खास?

नई दिल्ली। निजी स्कूलों की फीस नियंत्रण को लेकर प्रस्तावित नए फ्रेमवर्क में स्कूल-लेवल फीस रेगुलेशन कमेटी (SLFRC) की अहम भूमिका तय की गई है। इस व्यवस्था का उद्देश्य फीस निर्धारण प्रक्रिया को पारदर्शी और संतुलित बनाना है। नए फ्रेमवर्क के तहत हर निजी स्कूल में एक SLFRC का गठन अनिवार्य होगा। इस कमेटी की संरचना बहुपक्षीय रखी गई है, ताकि सभी हितधारकों की भागीदारी सुनिश्चित हो सके। इसमें स्कूल प्रबंधन के प्रतिनिधि, प्रिंसिपल , तीन शिक्षक ,  पांच अभिभावक ,शिक्षा निदेशालय का एक अधिकारी शामिल होंगे।

कमेटी के सदस्यों के चयन में निष्पक्षता बनाए रखने के लिए ऑब्जर्वर की मौजूदगी में लॉटरी सिस्टम अपनाया जाएगा, जिससे किसी प्रकार का पक्षपात न हो। SLFRC का मुख्य काम स्कूल प्रबंधन द्वारा प्रस्तुत फीस प्रस्ताव की जांच करना होगा। यह कमेटी प्रस्ताव का मूल्यांकन कर 30 दिनों के भीतर अपना निर्णय देगी, ताकि फीस निर्धारण में देरी न हो और अभिभावकों को समय पर स्पष्टता मिल सके।

Follow the LALLURAM.COM MP channel on WhatsApp
https://whatsapp.com/channel/0029Va6fzuULSmbeNxuA9j0m