नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट (Delhi High Court) ने एक अहम फैसले में राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि कोरोना महामारी के दौरान ड्यूटी करते समय जान गंवाने वाले एक स्कूल के वाइस प्रिंसिपल के परिवार को 1 करोड़ रुपये की अनुग्रह राशि दी जाए। यह आदेश जस्टिस पुरुषेद्र कुमार कौरव (Purushaindra Kumar Kaurav) ने सुनाया। अदालत ने कहा कि मृतक अधिकारी महामारी के दौरान फ्रंटलाइन वर्कर के रूप में अपनी जिम्मेदारी निभा रहे थे और उसी दौरान उनकी मृत्यु हुई। हाईकोर्ट ने इस मामले में मंत्री समूह (GoM) के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें परिवार को मुआवजा देने से इनकार किया गया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में मानवीय दृष्टिकोण अपनाना जरूरी है और फ्रंटलाइन पर काम करने वाले कर्मियों के योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट ने कोरोना काल में ड्यूटी के दौरान जान गंवाने वाले वाइस प्रिंसिपल के मामले में सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि नियमित ड्यूटी और कोविड ड्यूटी के बीच किया गया अंतर “मनमाना और अस्वीकार्य” है। अदालत ने कहा कि डॉ. राजा राम सिंह ने महामारी के कठिन समय में एक “योद्धा की तरह” काम किया और जरूरी सार्वजनिक सेवाएं जारी रखने के लिए अपनी जान जोखिम में डाली।

5 हफ्तों के भीतर 1 करोड़ रुपये का मुआवजा देने का आदेश

हाईकोर्ट ने कोरोना ड्यूटी के दौरान जान गंवाने वाले वाइस प्रिंसिपल के मामले में राज्य सरकार को 6 हफ्तों के भीतर 1 करोड़ रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया है। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 15 मई को तय की है। यह याचिका प्रेम शीला कुमारी ने दायर की थी, जिन्होंने अपने पति डॉ. राजा राम सिंह की मृत्यु के बाद न्याय की मांग करते हुए कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। अदालत ने अपने फैसले में पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि महामारी के दौरान ड्यूटी निभाने वाले कर्मचारियों के साथ नियमित और कोविड ड्यूटी का भेदभाव करना गलत है और ऐसे मामलों में मानवीय दृष्टिकोण अपनाना जरूरी है।

भूख राहत केंद्र में राशन वितरण की निगरानी कर रहे थे

डॉ. सिंह Government Boys Senior Secondary School C-Block Sangam Vihar (GBSSS) में वाइस प्रिंसिपल और स्कूल प्रमुख थे। 29 मई 2021 को उनका निधन हो गया था। बताया गया कि महामारी के चरम के दौरान वे भूख राहत केंद्र में राशन वितरण की निगरानी कर रहे थे। इसी दौरान उन्हें संक्रमण हुआ, जो बाद में उनकी मौत का कारण बना।

यह मामला तब शुरू हुआ, जब नवंबर 2023 में दिल्ली सरकार के मंत्री समूह (GoM) ने मुआवजे की मांग खारिज कर दी थी। GoM का तर्क था कि डॉ. सिंह सिर्फ अपनी नियमित ड्यूटी कर रहे थे और उन्हें आधिकारिक तौर पर कोविड ड्यूटी पर तैनात नहीं किया गया था। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए साफ किया कि महामारी के दौरान इस तरह की सेवाएं भी फ्रंटलाइन ड्यूटी के दायरे में आती हैं और इनके साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता।

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