दिल्ली हाई कोर्ट (Delhi High Court) में एक रुपये की सालाना लीज पर स्कूल के नाम पर ली गई जमीन को बैंक में गिरवी रखने का मुद्दा फिर से उठा। कोर्ट ने इस मामले में स्कूल सोसायटी, ऋण देने वाले बैंक, दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) और दिल्ली सरकार के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई। कोर्ट ने कहा कि स्कूल की जमीन को कारोबार में बदल दिया गया है, जो कानून और मूल उद्देश्य दोनों के खिलाफ है।

मुख्य न्यायाधीश देवेन्द्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की पीठ ने इस मामले को सरकारी महकमों के लचर रवैये के रूप में देखा। कोर्ट ने कहा कि स्कूल के लिए सस्ते दाम पर दी गई जमीन को बिना शिक्षा निदेशालय की अनुमति के गिरवी कैसे रखा जा सकता है। पीठ ने यह भी नोट किया कि डीडीए को लीज की जमीन को सशर्त गिरवी रखने के लिए पूर्व की नीति बदलने के आदेश दिए गए थे, लेकिन अब तक इस पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। इस मामले में डीडीए की तरफ से दाखिल जवाब में कहा गया कि स्कूल की जमीन का किसी और मकसद से इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने कहा कि नियमों के अनुसार स्कूल शिक्षा निदेशालय की अनुमति लेकर ही ऋण ले सकता है, लेकिन संबंधित स्कूल ने ऐसा नहीं किया। बिना अनुमति जमीन गिरवी रखी गई  लिया गया ऋण भी चुकाया नहीं गया  इसके चलते बैंक ने जमीन की नीलामी की प्रक्रिया शुरू कर दी थी, हालांकि बैंक की ओर से पेश वकील ने कोर्ट को बताया कि फिलहाल नीलामी प्रक्रिया रोक दी गई है। पीठ ने यह भी कहा कि डीडीए को पहले ही लीज जमीन को सशर्त गिरवी रखने की नीति में बदलाव करने के निर्देश दिए गए थे, लेकिन अब तक इस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।

क्या है मामला

दक्षिणी दिल्ली के एक बड़े निजी स्कूल ने 1988 में डीडीए से सालाना एक रुपये की लीज पर करीब चार एकड़ जमीन ली थी। स्कूल सोसायटी ने इस जमीन को गिरवी रखकर 2.20 करोड़ रुपये (2,20,32,638 रुपये) का ऋण बैंक से लिया  शिक्षा निदेशालय से अनुमति नहीं ली गई डेढ़ दशक से अधिक समय बीतने के बावजूद ऋण का भुगतान नहीं किया गया इसके चलते बैंक ने जमीन की नीलामी की प्रक्रिया शुरू कर दी, हालांकि कोर्ट में सुनवाई के दौरान बैंक के वकील ने बताया कि फिलहाल नीलामी पर रोक लगा दी गई है।

शिक्षा निदेशालय ने भी नहीं की कार्रवाई

इस मामले में शिक्षा निदेशालय ने तीन साल पहले कोर्ट को आश्वासन दिया था कि वह स्कूल को अपने नियंत्रण में लेगा। लेकिन अब तक न तो जमीन का कब्जा लिया गया और न ही कोई ठोस कार्रवाई की गई। इस पर भी कोर्ट ने नाराजगी जाहिर की। जनहित याचिका दायर करने वाले अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि यह कोई पहला मामला नहीं है। दिल्ली में करीब 37 अन्य निजी स्कूल सोसायटी भी हैं, जिन्होंने लीज की जमीन को गिरवी रखकर बैंकों से मोटी रकम का ऋण लिया। आरोप है कि इस रकम का इस्तेमाल शैक्षणिक उद्देश्यों के बजाय निजी जरूरतों के लिए किया गया।

दिल्ली में लोग मकान बनाकर रहने लगे

शिक्षा निदेशालय ने पहले हाई कोर्ट में दायर हलफनामे में स्वीकार किया था कि 176 निजी स्कूलों के निरीक्षण में गंभीर अनियमितताएं मिलीं। सस्ती दरों पर ली गई जमीन पर लोग मकान बनाकर रह रहे हैं जमीन का उपयोग शिक्षा के बजाय निजी उपयोग में किया जा रहा है उस समय भी निदेशालय ने कोर्ट को आश्वासन दिया था कि वह इन जमीनों पर कब्जा लेगा, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई, जिस पर कोर्ट ने नाराजगी जताई।

 निजी अस्पताल की जमीन का गलत इस्तेमाल

सुप्रीम कोर्ट ने 3 मार्च को 51 अस्पतालों को कड़ी फटकार लगाई थी। इनमें प्रमुख रूप से सर गंगाराम अस्पताल, बीएलके-मैक्स सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, फोर्टिस एस्कॉर्ट हार्ट इंस्टीट्यूट जैसे बड़े नाम शामिल हैं। कोर्ट ने कहा कि इन अस्पतालों को सस्ती दरों पर जमीन इस शर्त पर दी गई थी कि वे गरीबों को मुफ्त या रियायती इलाज देंगे, लेकिन इसके बावजूद इन शर्तों का पालन नहीं किया गया।

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