Supreme Court Hearing Sabarimala Temple Women Entry Issue: देश के शीर्ष न्यायालय सुप्रीम कोर्ट में आज देश की आधी आबादी यानी महिलाओं की धार्मिक अधिकारों से संबंधित कई मामलों में सुनवाई हो रही है। इन मामलों में मुस्लिम महिलाओं का खतना और मस्जिद में नमाज पढ़ने से लेकर सबरीमाला में महिलाओं की एंट्री और गैर धर्म में शादी करने वाली पारसी महिलाओं को धार्मिक स्थलों में जाने का अधिकार मिलने वाली याचिकाओं पर सुनवाई हो रही है। सबसे पहले केरल स्थित सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री मामले पर सूुनवाई हो रही है। केंद्र सरकार ने मामले में सुप्रीम कोर्ट में अपना जवाब दे दिया है।

सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश दिए जाने के मामले पर केंद्र सरकार ने कहा कि यह मुद्दा केवल लैंगिक समानता का नहीं है, बल्कि धार्मिक आस्था और परंपरा से भी जुड़ा हुआ है। सरकार ने कहा कि अदालत धार्मिक मामलों में दखल न दें।अदालतें आस्था या विश्वास पर फैसला नहीं कर सकतीं।

सरकार ने कहा कि- सबरीमाला में 10 से 50 साल की महिलाओं के प्रवेश पर रोक इसलिए है, क्योंकि भगवान अयप्पा को ‘नैष्ठिक ब्रह्मचारी’ माना जाता है, यानी उन्होंने जीवन भर ब्रह्मचर्य का पालन किया। इसका महिलाओं की शुद्धता या उनकी स्थिति से कोई संबंध नहीं है। यदि महिलाओं को प्रवेश दिया जाता है, तो वहां की पारंपरिक पूजा-पद्धति बदल जाएगी। इससे संविधान द्वारा संरक्षित धार्मिक विविधता पर असर पड़ सकता है।

साथ ही केंद्र ने सबरीमाला पुनर्विचार याचिकाओं के जवाब में साल 2018 के उस फैसले पर पुनर्विचार का समर्थन किया, जिसमें सभी महिलाओं को प्रवेश की अनुमति दी गई थी। सरकार का तर्क है कि यह मुद्दा केवल लैंगिक समानता का नहीं है, बल्कि धार्मिक आस्था और परंपरा से भी जुड़ा हुआ है। अदालतों को आवश्यक धार्मिक प्रथाओं या देवता के गुणों की पुनर्व्याख्या नहीं करनी चाहिए। केंद्र ने यह भी कहा कि न्यायिक समीक्षा को संवैधानिक सिद्धांतों का सम्मान करना चाहिए और धार्मिक मानदंडों को संबंधित समुदायों पर छोड़ देना चाहिए।

इन प्रमुख मामलों में आएगा फैसलाः-

दाऊदी बोहरा समुदाय में महिलाओं का खतना: क्या यह प्रथा मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है? शिया इस्लाम की इस्माइली शाखा में 2017 में एड. सुनीता तिवारी ने दाऊदी बोहरा समुदाय में महिला खतना का मुद्दा उठाया और सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की।

मस्जिदों में महिलाओं का प्रवेश: क्या मुस्लिम महिलाओं को मस्जिद में नमाज पढ़ने से रोका जा सकता है। 2016 में यास्मीन जुबैर अहमद पीरजादा नाम की महिला ने मुस्लिम महिलाओं का मस्जिद में प्रवेश का मुद्दा उठाया और सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की।

सबरीमाला मंदिर में महिलाओं का प्रवेश: क्या सभी आयु की महिलाओं को प्रवेश का अधिकार है? बेंच यह तय करेगी कि साल 2018 में इंडियन यंग लायर एसोसिएशन Vs स्टेट ऑफ केरल मामले में हाईकोर्ट का फैसला सही था या नहीं। मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं को प्रवेश की इजाजत दिए जाने के इस फैसले का रिव्यू करने के लिए मंदिर के पुजारी समेत कुछ संस्थाओं ने याचिका लगाई है, तो कुछ संगठन इसके खिलाफ हैं।

पारसी महिलाओं का अग्निमंदिर में प्रवेश: क्या गैर-पारसी से शादी करने वाली पारसी महिला को अग्नि मंदिर में प्रवेश से रोका जा सकता है? 2012 में पारसी महिला गूलरुख एम गुप्ता ने हिंदु व्यक्ति से शादी की। उन्हें पारसी धर्मस्थलों में प्रवेश से रोका जाने लगा। उन्होंने इसके खिलाफ बॉम्बे हाईकोर्ट में पारसी महिलाओं के धार्मिक अधिकार को लेकर याचिका लगाई। बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

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