राजस्थान के कोटा की रहने वाली 15 साल की तन्वी की दुखद मौत ने एक बार फिर से बड़े अस्पतालों में इंतजार के समय पर सवाल खड़े कर दिए हैं. देश के सबसे प्रतिष्ठित मेडिकल संस्थान एम्स दिल्ली (AIIMS Delhi) में 15 साल की तन्वी को इलाज की जगह मौत मिली. तन्वी को हार्ट सर्जरी (Heart Surgery) की जगह Delhi AIIMS से सिर्फ तारीख पर तारीख मिली. आखिरकार 13 साल के लंबे इंतजार के बाद मासूम तन्वी मौत से जंग हार गई. अब तन्वी की मौत मामले में एम्स दिल्ली ने जांच कमेटी गठित की। लेकिन सवाल यह है कि आखिर इतने बड़े अस्पताल में आखिर कितनी वेटिंग होती है.

नेताओं को उसी दिन बिना देरी के इलाज

दिल्ली एम्स (AIIMS) में सांसदों और वीआईपी नेताओं के इलाज के लिए विशेष मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) के तहत बिना किसी देरी के तत्काल (उसी दिन) ओपीडी, इमरजेंसी और भर्ती की व्यवस्था की जाती है. नेताओं के लिए 24 घंटे एक विशेष ड्यूटी ऑफिसर (डॉक्टर) और कंट्रोल रूम काम करता है. सांसदों को डॉक्टरों से मिलने के लिए लंबी कतारों में इंतजार नहीं करना पड़ता है. जरूरत पड़ने पर उन्हें तुरंत बेड और उपचार उपलब्ध कराया जाता है.

वहीं आम नागरिकों को कितना इंतजार ?

तन्वी बचपन से ही दिल की गंभीर बीमारी से जूझ रही थी और सर्जरी की उम्मीद में कई सालों से अपने परिवार के साथ AIIMS दिल्ली जा रही थी. लगभग 13 साल के इलाज और सलाह मशविरे के बाद हार्ट लंग ट्रांसप्लांट की तैयारी के दौरान ही उसकी मौत हो गई. उसके मामले ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है. AIIMS में मरीज को असल में कितना इंतजार करना पड़ता है? आइए जानते हैं क्या है इस सवाल का जवाब.

रजिस्ट्रेशन और ओपीडी कंसल्टेशन

इंतजार का पहला दौर रजिस्ट्रेशन से शुरू होता है. जो मरीज बिना अपॉइंटमेंट के ओपीडी जाते हैं उन्हें लंबी लाइनों का सामना करना पड़ सकता है. खासकर सुबह के व्यस्त समय में. संसद में सरकार द्वारा दी गई जानकारी और आरटीआई रिपोर्ट्स के मुताबिक वॉक इन रजिस्ट्रेशन में लगभग 2 से 4 घंटे लग सकते हैं.

जो मरीज ORS पोर्टल या फिर AIIMS की वेबसाइट के जरिए ऑनलाइन अपॉइंटमेंट बुक करते हैं वे शुरुआती रजिस्ट्रेशन लाइन से बच सकते हैं. हालांकि कुछ विभागों में सीमित स्लॉट और ज्यादा मांग की वजह से ऑनलाइन अपॉइंटमेंट मिलने में ही एक से तीन हफ्ते लग सकते हैं.

डायग्नोस्टिक टेस्ट का इंतजार

एक बार जब मरीज डॉक्टर से सलाह ले लेता है तो रिटर्न जांच जैसे की ब्लड और यूरिन टेस्ट आमतौर पर उसी दिन या फिर अगले दिन पूरे हो जाते हैं. सीटी स्कैन और अल्ट्रासाउंड जांच के लिए मरीजों को 1 से 3 महीने बाद की अपॉइंटमेंट तारीख मिल सकती है. एमआरआई स्कैन के लिए काफी ज्यादा मांग की वजह से और भी लंबा इंतजार करना पड़ सकता है. कुछ मामलों में मरीजों को एमआरआई अपॉइंटमेंट के लिए 6 महीने से 1 साल तक का इंतजार करना पड़ सकता है.

दिल और दिमाग की सर्जरी में सबसे ज्यादा समय लग सकता है

कार्डियोथोरेसिक सर्जरी और न्यूरो सर्जरी जैसे खास विभागों में काफी बड़ी संख्या में मरीज आते हैं. पहले से तय नॉन इमरजेंसी ऑपरेशन के लिए इंतजार का समय काफी बढ़ सकता है.

रिपोर्ट्स के मुताबिक जिन मरीजों को दिल या फिर दिमाग की सर्जरी की जरूरत होती है उन्हें नॉन इमरजेंसी मामले में 2 साल तक इंतजार करना पड़ सकता है. असल इंतजार का समय बीमारी की गंभीरता, मेडिकल प्राथमिकता, ऑपरेटिंग स्टॉल की उपलब्धता और मरीज की कुल हालत पर निर्भर करता है.

कैंसर की सर्जरी में कितना समय लगता है?

कैंसर के मरीजों को आमतौर पर प्राथमिकता दी जाती है क्योंकि उनकी बीमारी गंभीर हो सकती है. हालांकि बड़े टर्शियरी केयर अस्पताल में मरीजों की भारी भीड़ की वजह से फिर भी देरी हो सकती है. कैंसर की सर्जरी के लिए इंतजार का समय लगभग 3 महीने तक हो सकता है. यह कैंसर के प्रकार, उसकी स्टेज और इलाज करने वाले टीम द्वारा तय की गई जरूरत की गंभीरता पर निर्भर करता है.

जीआई और जनरल सर्जरी के बारे में क्या?

पेट, आंत या फिर लिवर से जुड़ी समस्याओं के लिए बड़े गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल ऑपरेशन की जरूरत वाले मरीजों को तय सर्जरी के लिए लगभग 3 से 6 महीने तक का इंतजार करना पड़ सकता है.

हर्निया या फिर पित्त की थैली से जुड़ी समस्याओं के ऑपरेशन जैसे आम प्रोसीजर के लिए इंतजार का समय आमतौर पर कम होता है. जनरल सर्जरी के लिए इंतजार का समय लगभग 2 महीने हो सकता है.

कुछ विभागों में इंतजार का समय कम होता है

AIIMS के हर विभाग में मरीजों का दबाव एक जैसा नहीं है. ज्यादा दबाव वाले विभागों की तुलना में आंखों का विभाग, कान, नाक और गले का विभाग, पीडियाट्रिक्स, बर्न और प्लास्टिक सर्जरी, यूरोलॉजी और डेंटिस्ट्री जैसे विभागों में डेंटिस्ट्री जैसे विभागों में तय सर्जरी के लिए इंतजार का समय आमतौर पर कम होता है. इन विभागों में मरीजों को सर्जरी की तारीखें अपेक्षाकृत जल्दी मिल सकती हैं, हालांकि सही समय अभी भी मरीज की स्थिति और उपलब्धता पर निर्भर कर सकता है.

इमरजेंसी वाले मरीज एक ही लाइन में नहीं लगते

सबसे जरूरी फर्क इमरजेंसी और तय इलाज के बीच है. ऊपर बताए गए इंतजार के समय मुख्य रूप से नॉन इमरजेंसी मामलों पर लागू होते हैं. अगर किसी मरीज की हालत गंभीर है और जान को तुरंत खतरा है तो क्लीनिकल प्राथमिकता के आधार पर इमरजेंसी मेडिकल इलाज दिया जाता है. ऐसे मरीजों से इलाज के लिए महीनों या फिर सालों तक इंतजार करने की उम्मीद नहीं की जाती है, सिर्फ इसलिए कि अस्पताल में एक तय वेटिंग लिस्ट है.

सांसदों या मंत्रियों की सिफारिश से पहुंचे एम्स

एम्स में इलाज के लिए किसी माननीय की सिफारिश है तो मरीज को ज्यादा परेशान होने की जरूरत नहीं. ऐसे मरीजों को डॉक्टरों से समय लेने के लिए इंतजार भी नहीं करना पड़ता है. एम्स में सांसदों व मंत्रियों के सिफारिशी मरीजों के लिए विशेष व्यवस्था की गई है. इसके तहत एक मार्च से पंजीकरण केंद्र में अलग से विशेष काउंटर शुरू किया गया है. संस्थान के निदेशक, उपनिदेशक (प्रशासनिक), चिकित्सा अधीक्षक व फैकल्टी के माध्यम से इलाज के लिए पहुंचने वाले मरीजों के लिए पंजीकरण केंद्र में दो काउंटर आरक्षित कर दिए गए हैं.

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