मुकेश मेहता, बुधनी। मुख्यमंत्री जन-विश्वास कार्यक्रम में एक ओर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने सादगी और संसाधनों के मितव्ययी उपयोग का संदेश दिया, वहीं दूसरी ओर सीहोर जिले के प्रशासनिक अधिकारियों का शाहगंज पहुंचने का अंदाज चर्चा का विषय बन गया। करीब डेढ़ सौ किलोमीटर दूर आयोजित कार्यक्रम में जिले के अनेक अधिकारी अलग-अलग सरकारी वाहनों से पहुंचे।
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मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के काफिले में भी वाहनों की संख्या कम रखने और इलेक्ट्रिक वाहन के इस्तेमाल का संदेश सामने आया। इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी सरकारी कार्यक्रमों में अनावश्यक वाहनों की संख्या कम करने और ईंधन की बचत पर जोर देते रहे हैं। मुख्यमंत्री ने भी हाल ही में कैबिनेट की बैठक के दौरान मंत्रियों के साथ बस से यात्रा कर सादगी का संदेश दिया था।
इसी क्रम में भोपाल संभाग के कमिश्नर और कलेक्टर सहित अधिकारियों के जन-विश्वास कार्यक्रम में बस से पहुंचने की पहल भी सामने आई थी। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि जब संभाग स्तर के अधिकारी सामूहिक रूप से एक बस से कार्यक्रम में पहुंच सकते हैं, तो सीहोर जिले के अधिकारी भी एक साथ बस अथवा सीमित वाहनों में शाहगंज क्यों नहीं पहुंच सकते थे?
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एक ही कार्यक्रम में बड़ी संख्या में अधिकारियों का अलग-अलग वाहनों से पहुंचना न केवल सरकारी वाहनों और ईंधन के इस्तेमाल को बढ़ाता है, बल्कि मुख्यमंत्री के सादगी और मितव्ययिता के संदेश पर भी सवाल खड़े करता है। सवाल यह नहीं कि अधिकारी कार्यक्रम में क्यों पहुंचे, सवाल यह है कि कैसे पहुंचे?
जन-विश्वास जैसे महत्वपूर्ण कार्यक्रम में अधिकारियों की मौजूदगी जरूरी है, लेकिन प्रशासनिक व्यवस्था में संसाधनों के बेहतर उपयोग की जिम्मेदारी भी इन्हीं अधिकारियों की होती है। जब सरकार स्तर पर अनावश्यक खर्च और ईंधन की बचत का संदेश दिया जा रहा हो, तब जिले के अधिकारी सामूहिक यात्रा का उदाहरण प्रस्तुत कर सकते थे।
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लोगों के बीच यह चर्चा भी है कि सरकार आम जनता से मितव्ययिता और संसाधनों के सदुपयोग की अपेक्षा करती है, तो क्या सरकारी तंत्र को स्वयं इसका उदाहरण पेश नहीं करना चाहिए? मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के सादगी भरे संदेश के बावजूद यदि अधिकारी अपने-अपने वाहनों के साथ कार्यक्रमों में पहुंचते हैं, तो यह सवाल जरूर खड़ा होता है कि सरकार का संदेश नीचे तक आखिर कितना पहुंच रहा है? अब सवाल प्रशासन से है-जब एक बस में अधिकारी सामूहिक रूप से शाहगंज पहुंच सकते थे, तो अलग-अलग सरकारी वाहनों का काफिला क्यों?
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