Holi Special Story : गरियाबंद. रंगों के त्योहार होली को भारत के कई राज्यों में मनाया जाता है. इस पर्व को लेकर बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक भारी उत्साह देखने को मिलता है. वर्ष 2026 में यह त्योहार चंद्रग्रहण के कारण 4 मार्च यानी बुधवार को मनाई जाएगी. छत्तीसगढ़ राज्य में भी होली की धूम देखने को मिलती है. लेकिन एक गांव ऐसा भी हैं, जहां पिछले 100 सालों से अनोखी परंपरा के चलते न होलिका दहन होती है और न ही रंग गुलाल खेलते हैं.

छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले के मैनपुर तहसील मुख्यालय से करीब 80 किमी दूर ग्राम पंचायत खजुरपदर में करीब 2 हजार लोग रहते हैं. ग्रामीणों के अनुसार पिछले 100 सालों से गांव में होली का त्योहार नहीं मनाया गया होगा. देवियों का आदेश हैं, इसलिए होली नहीं मनाई जाती, यह परंपरा कई सालों से चली आ रही है. त्योहार में यहां की दिनचर्या सामान्य दिनों की तरह होती है. ग्रामीणों का दावा है कि होली का त्योहार मनाए जाने से गांव की देवी नाराज हो जाती है, देवी का प्रकोप बढ़ जाता है. गांव में प्रमुख देवी के रूप में ग्राम श्रीमाटी देवता और शानपाठ देवी की पूजा-अर्चना होती है. दोनों देवियों के आदेशानुसार ही गांव में होली नहीं मनाते हैं. होली में लोग अपने घरों में ही रहते हैं और देवी-देवताओं की पूजा अर्चना करते हैं.
देवी को पसंद नहीं रंग-गुलाल, ग्रामीणों की बिगड़ी थी तबियत
बताया जाता है कि कई वर्ष पहले जब गांव में होली खेली गई थी, तब देवी नाराज हो गई थीं. मान्यता है कि देवी को रंग-गुलाल पसंद नहीं है. उस घटना के बाद गांव में बीमारियों का प्रकोप बढ़ गया था और लोग बड़ी माता (चेचक) के साथ उल्टी-दस्त जैसी बीमारियों से पीड़ित हो गए थे. स्थिति बिगड़ने पर पूर्वजों ने देवी माता से क्षमा मांगी, मान-मनौव्वल और पूजा-अर्चना की, तब जाकर गांव में हालात सामान्य हुए. तभी से आज तक गांव में होली नहीं खेलने की परंपरा चली आ रही है.
बाहरी लोग भी नहीं खेलते होली
गांव में बाहरी लोग भी इस परंपरा का पालन करते हैं. खजुरपदर में होली न खेलने की परंपरा आसपास के गांव के लोग भी जानते हैं. होली के दिन यदि किसी दूसरे गांव का व्यक्ति यहां पहुंचता भी है, तो वह ग्रामीणों पर रंग लगाने की कोशिश नहीं करता और सीधे अपने रास्ते निकल जाता है. गांव के युवा भी इस परंपरा का पूरी निष्ठा से पालन कर रहे हैं.
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