दिल्ली में एक बार फिर से ऐतिहासिक फूल वालों की सैर का आयोजन शुरू हो गया है। दिल्ली सचिवालय में शहनाई की मधुर धुनों के बीच इस उत्सव का भव्य शुभारंभ किया गया। इस अवसर पर मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता समेत कई मंत्री और विभिन्न सामाजिक संगठनों के लोग उपस्थित रहे। मुख्यमंत्री ने कहा कि फूल वालों की सैर सिर्फ एक त्योहार नहीं है, बल्कि यह दिल्ली की साझा संस्कृति और भाईचारे की जीवंत मिसाल है।
उन्होंने आगे कहा कि यह परंपरा हमें याद दिलाती है कि अलग-अलग धर्म और समुदाय के लोग मिलकर भी त्योहार मना सकते हैं और सामाजिक सौहार्द को बढ़ावा दे सकते हैं। इस साल की सैर में रंग-बिरंगे फूलों से सजाए गए झांकियाँ, संगीत और सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ शामिल हैं, जो राजधानी के लोगों और आगंतुकों के लिए एक आकर्षक दृश्य पेश करेंगी।
जानकारी के अनुसार, यह उत्सव करीब एक हफ्ते तक चलता है। इसमें हिंदू और मुस्लिम समुदाय के लोग मिलकर पूजा और चादर चढ़ाने की परंपरा निभाते हैं। मेहरौली स्थित ख्वाजा बख्तियार काकी की दरगाह पर फूलों की चादर और पंखा चढ़ाया जाता है। इसके बाद फूलों का पंखा और छत्र मेहरौली के प्राचीन योगमाया मंदिर में भी अर्पित किया जाता है। उत्सव में रंग-बिरंगे फूलों से सजाए गए झांकियाँ, सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ और संगीत शामिल हैं, जो दिल्लीवासियों और आगंतुकों के लिए आकर्षण का केंद्र बनते हैं।
संस्था के सदस्यों ने भेंट किया फूलों का पंखा
कार्यक्रम में आयोजक संस्था अंजुमन सैर-ए-गुल फरोशां के सदस्यों ने मुख्यमंत्री का पारंपरिक तरीके से स्वागत किया। उन्हें फूलों का पंखा भेंट किया गया, जो इस मेले की पुरानी परंपरा का हिस्सा है। जानकारी के अनुसार, यह उत्सव करीब एक हफ्ते तक चलता है। इसमें हिंदू और मुस्लिम समुदाय के लोग मिलकर पूजा और चादर चढ़ाने की परंपरा निभाते हैं। मेहरौली स्थित ख्वाजा बख्तियार काकी की दरगाह पर फूलों की चादर और पंखा चढ़ाया जाता है। इसके बाद फूलों का पंखा और छत्र मेहरौली के प्राचीन योगमाया मंदिर में भी अर्पित किया जाता है।
आयोजकों ने बताया कि यह त्योहार आमतौर पर नवंबर में मनाया जाता है, लेकिन पिछले साल यह कार्यक्रम नहीं हो पाया था। दरअसल, मेहरौली के आम बाग में आयोजन की अनुमति नहीं मिली थी। प्रशासन के हस्तक्षेप के बाद इस बार अनुमति मिल गई और उत्सव फिर से शुरू हो सका।
मुगल दौर से जुड़ी है परंपरा
इतिहासकारों के अनुसार, फूल वालों की सैर की शुरुआत मुगल काल में हुई थी। मान्यता है कि एक मन्नत पूरी होने पर लोगों ने फूलों का पंखा बनाकर दरगाह और मंदिर दोनों जगह चढ़ाने की परंपरा शुरू की थी। समय के साथ यह परंपरा एक बड़े मेले में बदल गई। आज यह उत्सव फूलों से सजे पंखों, झांकियों, संगीत, नृत्य और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का संगम बन चुका है। दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में लोग इसमें भाग लेते हैं, जो इसे राजधानी के प्रमुख सांस्कृतिक आयोजनों में शामिल करता है।
गंगा-जमुनी तहजीब की पहचान
इस मेले की सबसे खास बात यह है कि इसमें धर्म की कोई दीवार नहीं होती। हिंदू और मुस्लिम समुदाय के लोग मिलकर इस उत्सव को मनाते हैं। यही कारण है कि इसे दिल्ली की गंगा-जमुनी तहजीब की पहचान माना जाता है। आज भी यह परंपरा लोगों को आपसी प्यार, भाईचारे और एकता का संदेश देती है। यही वजह है कि दिल्ली के लोग हर साल इस उत्सव का बेसब्री से इंतजार करते हैं और बड़ी संख्या में इसमें शामिल होते हैं।
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