वैदिक पंचांग के अनुसार वैशाख माह को सभी 12 महीनों का राजा कहते हैं. यह माह भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है. इसलिए इस दौरान किए गए स्नान, दान, जप और तप का फल अक्षय अर्थात कभी समाप्त न होने वाला फल मिलता है. स्कंद पुराण में नारद जी और राजा अंबरीष के संवाद में वैशाख माह की महिमा का विशेष वर्णन मिलता है. जिसमें इसे गंगा, कल्पतरु, गरुड़ और स्वर्ण के समान श्रेष्ठ बताया गया है.

इस माह में प्रातःकाल स्नान करना अत्यंत आवश्यक माना गया है. विशेष रूप से गंगा स्नान करने से सभी पापों का नाश होता है. जो व्यक्ति इस माह में नित्य स्नान नहीं करता, उसे शास्त्रों में अशुभ फल का भागी बताया गया है. पंचांग के अनुसार वैशाख माह की शुरूआत 2 अप्रैल से होने वाली है. जिसका समापन वैशाख पूर्णिमा 1 मई को होगा.

वैशाख महीने में दान का भी है विशेष महत्व

इस पूरी माह में जल दान, पंखा, छाता, चप्पल और अन्न दान करने से पितरों की तृप्ति होती है. व्यक्ति को पुण्य की प्राप्ति होती है. ज्योतिषीय दृष्टि से भी यह महीना खास होता है क्योंकि इस समय सूर्य मेष राशि में उच्च का होता है. चंद्रमा वृषभ में उच्च का होता है. यह दुर्लभ संयोग पूरे वर्ष में एक बार बनता है. जिससे ग्रह दोषों का प्रभाव कम हो जाता है. इसके अलावा, यह महीना सेवा और पर्यावरण संरक्षण का भी संदेश देता है.

गर्मी के कारण जल की कमी को देखते हुए पक्षियों और जरूरतमंदों के लिए पानी और भोजन की व्यवस्था करना अत्यंत पुण्यदायक माना गया है. वैशाख मास में अक्षय तृतीया और पूर्णिमा जैसी महत्वपूर्ण तिथियां भी आती हैं. जिन्हें अत्यंत शुभ माना जाता है. इस प्रकार यह माह धर्म, दान, तप और मानवता का अद्भुत संगम है.