केंद्र सरकार ने गुरुवार को केरल के सबरीमाला मंदिर में मासिक धर्म आयु की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध का समर्थन किया। केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का 2018 का फैसला इस धारणा पर आधारित है कि पुरुष श्रेष्ठ हैं और महिलाएं निम्न हैं। इसी वजह से सभी महिलाओं को एंट्री देने का आदेश दिया गया। सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव से जुड़े मामलों की बुधवार को लगातार तीसरे दिन सुनवाई कर रही है। इसमें विभिन्न धर्मों में प्रचलित धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा और दायरे पर भी विचार किया जा रहा है।

केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि उन्होंने लिखित स्टेटमेंट में ऐसे उदाहरण दिए हैं जहां पुरुषों को मंदिरों में प्रवेश की अनुमति नहीं होती। केरल के कोट्टनकुलंगरा श्री देवी मंदिर में, चामयाविलक्कु उत्सव के दौरान पुरुष हर साल महिलाओं के वेश में सजते हैं, जो देवी के सम्मान में सदियों पुरानी परंपरा है। वे ब्यूटी पार्लर जाते हैं और परिवार की महिलाएं उन्हें साड़ी पहनने में मदद करती हैं। मेहता ने कहा कि इसलिए यह पुरुष केंद्रित या महिला केंद्रित धार्मिक मान्यताओं का सवाल नहीं है। वर्तमान मामले में यह महिला केंद्रित है।

कोर्ट ने कहा- हमारे पास अंधविश्वास तय करने का अधिकार

वहीं इससे पहले मामले में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि किसी धर्म में कौन सी प्रथा अंधविश्वास है, यह तय करने का अधिकार उसके क्षेत्राधिकार में आता है। अदालत की यह टिप्पणी सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल Tushar Mehta की दलील पर आई। उन्होंने कहा था कि धर्मनिरपेक्ष अदालत को धार्मिक प्रथाओं पर फैसला नहीं करना चाहिए, क्योंकि न्यायाधीश कानून के विशेषज्ञ होते हैं, धर्म के नहीं। उन्होंने सवाल उठाया कि अदालत कैसे तय कर सकती है कि कौन सी प्रथा अंधविश्वास है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि कोई प्रथा अंधविश्वास मानी भी जाए, तो उसमें हस्तक्षेप करना अदालत का नहीं, बल्कि विधायिका का काम है, जैसा कि संविधान के अनुच्छेद 25(2)(ब) में प्रावधान है।

सुप्रीम कोर्ट में 50 से ज्यादा रिव्यू पिटीशन

धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव का मामला बीते 26 सालों से देश की अदालतों में हैं। 2018 में, 5 जजों की बेंच ने 4:1 के बहुमत से मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक हटा दी थी। इसके बाद कई पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं।

सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों की संविधान बेंच 7 अप्रैल से 22 अप्रैल तक 50 से ज्यादा याचिकाओं पर सुनवाई करेगी। कोर्ट में रिव्यू पिटीशनरों और उन्हें सपोर्ट करने वाले 7 अप्रैल से 9 अप्रैल तक, जबकि विरोध करने वाले 14 अप्रैल से 16 अप्रैल तक दलीलें दे सकेंगे।

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