अमित पांडेय, डोंगरगढ़। राजनांदगांव जिले के डोंगरगढ़ का बहुचर्चित खालसा पब्लिक स्कूल कांड आखिरकार उस मोड़ पर पहुंचा है, जहां कानून ने दस्तक दी है, लेकिन एक मासूम के जीवन में जो सन्नाटा पसर चुका है, उसकी भरपाई अब भी असंभव नजर आती है। करीब नौ महीने पहले कक्षा 7वीं के छात्र सार्थक सहारे के साथ जो हुआ, वह महज “अनुशासन” नहीं, बल्कि एक ऐसा हिंसक क्षण था जिसने उसकी सुनने की दुनिया को हमेशा के लिए बदल दिया। एक साधारण सी देरी, किताब निकालने में कुछ सेकंड और उसके बाद गूंजे थप्पड़ों ने उस बच्चे के कानों में ऐसी चोट दी कि आवाजें उससे दूर होती चली गईं।
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आरोप है कि क्लास टीचर नम्रता साहू की शिकायत पर इंचार्ज शिक्षिका प्रियंका सिंह कक्षा में पहुंचीं और गुस्से में आकर छात्र के दोनों कानों पर जोरदार थप्पड़ जड़ दिए। उस वक्त शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि यह क्षण एक बच्चे के भविष्य पर इतनी भारी कीमत बन जाएगा। घर पहुंचकर जब सार्थक ने कहा कि उसे ठीक से सुनाई नहीं दे रहा, तब परिवार को अंदेशा हुआ कि बात सामान्य नहीं है और मेडिकल जांच ने उस डर को हकीकत में बदल दिया।
पिता सुधाकर सहारे की शिकायत पर मामला डोंगरगढ़ थाना पहुंचा, लेकिन न्याय की राह आसान नहीं थी। महीनों तक इंतजार, गुहार और सिस्टम की धीमी चाल के बीच परिवार की उम्मीदें कई बार डगमगाईं। इसी बीच Lalluram.com ने इस मुद्दे को लगातार उठाया, पीड़ित परिवार की आवाज को मंच दिया और मामले को जिंदा रखा, जिसका असर आखिरकार दिखा। पुलिस अधीक्षक अंकिता शर्मा के निर्देश में हुई जांच के बाद आरोपी शिक्षिका प्रियंका सिंह को 11 अप्रैल 2026 को गिरफ्तार कर लिया गया और न्यायालय में पेश कर न्यायिक अभिरक्षा में भेज दिया गया। मामले में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं के तहत कार्रवाई की गई है।
वहीं इस घटना में शामिल दूसरी शिक्षिका नम्रता साहू अब भी फरार है, जिसकी तलाश जारी है। यह गिरफ्तारी निश्चित रूप से एक कानूनी कदम है, लेकिन सवाल अब भी बाकी हैं क्या यह न्याय की शुरुआत है या अंत? क्या उस बच्चे की सुनने की खो चुकी दुनिया लौट पाएगी? और सबसे बड़ा सवाल, क्या स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा सिर्फ कागजों तक सीमित रह जाएगी? डोंगरगढ़ खालसा स्कूल का यह मामला सिर्फ एक केस नहीं, बल्कि एक चेतावनी है कि जब अनुशासन की आड़ में संवेदनहीनता हावी हो जाती है, तो उसकी कीमत सबसे मासूम को चुकानी पड़ती है। अब पूरा समाज और प्रशासन इस बात पर टिका है कि न्याय सिर्फ गिरफ्तारी तक सीमित न रहे, बल्कि उस मासूम के भविष्य को संवारने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएं।
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