वाराणसी. काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर में मंगलवार को भगवत्पाद शिवावतार श्रीमद्जगद्गुरु आदि शंकराचार्य जी की 2533वीं जयंती के पावन अवसर पर विशेष आयोजन किया गया. इस अवसर पर प्रोफेसर सिद्धिदात्री के मार्गदर्शन में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों की ओर से आदि शंकराचार्य जी की प्रतिमा के समक्ष बैठकर उनके द्वारा रचित स्तोत्रों का भावपूर्ण पाठ किया गया. कार्यक्रम का प्रारंभ गणेश पंचरत्नम् के पाठ से हुआ, तत्पश्चात अन्नपूर्णा स्तोत्रम्, शिव मानस पूजन, वेद शरणम् शिव स्तुति, भवान्यष्टकम्, निर्वाणषट्कम् और दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम् का क्रमबद्ध रूप से उच्चारण किया गया. विद्यार्थियों ने पूर्ण श्रद्धा और एकाग्रता के साथ इन स्तोत्रों का पाठ कर वातावरण को आध्यात्मिक भाव से भर दिया.
इस अवसर पर उपस्थित श्रद्धालुओं ने भी इस आयोजन में सहभागिता कर जगद्गुरु आदि शंकराचार्य जी के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट की. संपूर्ण कार्यक्रम अत्यंत गरिमामय और अनुशासित ढंग से संपन्न हुआ. काशी विश्वनाथ मंदिर प्रशासन ने इस प्रकार के आयोजन को भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण और संवर्धन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया.
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आचार्य शंकर का जन्म 507 ईसा पूर्व (करीब 2500 साल पहले) में केरल में पूर्णा नदी के तट पर स्थित कालड़ी गांव में हुआ था. आचार्य शंकर के पिता का नाम शिवगुरु भट्ट और माता का नाम आर्याम्बा था. बहुत दिन तक सपत्नीक शिव को आराधना करने के अनंतर शिवगुरु ने पुत्ररत्न पाया था. इसलिए उस का नाम शंकर रखा गया. जब ये तीन ही वर्ष के थे तब इनके पिता का देहांत हो गया. आचार्य शंकर बड़े ही मेधावी और प्रतिभाशाली थे. 6 साल की अवस्था में ही ये प्रकांड पंडित हो गए थे और 8 वर्ष की अवस्था में इन्होंने संन्यास ग्रहण किया था.
आचार्य शंकर के संन्यास ग्रहण करने के समय की कथा बड़ी विचित्र है. कहते हैं कि माता एकमात्र पुत्र को संन्यासी बनने की आज्ञा नहीं देती थीं. तब एक दिन नदी किनारे एक मकर ने आचार्य शंकर का पैर पकड़ लिया तब इस समय का फायदा उठाते आचार्य शंकर ने अपनी माता से कहा “मुझे सन्यास लेने की आज्ञा दो नहीं तो यह मकर मुझे खा जायेगा”, इस से भयभीत होकर माता ने तुरंत इन्हें संन्यासी होने की आज्ञा प्रदान की. और आश्चर्य है कि जैसे ही माता ने आज्ञा दी वैसे ही तुरन्त मकर ने आचार्य शंकर का पैर छोड़ दिया.
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बता दें कि शंकराचार्य हिंदू धर्म के सर्वोच्च धर्मगुरु हैं. भगवान आदि शंकराचार्य जी को सनातन धर्म को संगठित कर पुनर्जीवित करने का श्रेय जाता है. यदि उन्हें सनातन धर्म का आधार स्तंभ कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी. उन्होंने संसार को अद्वैत सिद्धांत का सूत्र दिया. सब एक हैं कहते हुए उन्होंने समूचे मानव समाज को एकता के सूत्र में पिरोया. 32 वर्ष की अपनी जीवनलीला में उन्होंने कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक चार बार पदयात्रा की. इस दौरान उन्होंने अपने शास्त्रार्थ से सभी मतों और संप्रदायों को सनातन धर्म के अधीन कर दिया.
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