बंगाल में पहली बार बीजेपी सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाने वाले शुभेंदु अधिकारी को पार्टी ने मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी सौंप दी है. आज कोलकाता में होने वाली बीजेपी विधायक दल की बैठक में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने शुभेंदु अधिकारी को बीजेपी विधायक दल का नेता घोषित कर दिया. इसके साथ ही शुभेंदु अधिकारी ने राज्यपाल से मुलाकात कर सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया है. बता दें कि बीजेपी ने बंगाल में 207 सीटों पर जीत हासिल कर प्रचंड बहुमत हासिल किया है. कल सुबह 11 बजे शुभेंदु बंगाल के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे. शुभेंदु अधिकारी के रूप में बीजेपी को न केवल बंगाल बल्कि पूर्वोत्तर भारत में एक हार्डकोर नेता मिलेगा.
बंगाल के अगले सीएम बनने वाले शुभेंदु अधिकारी का का सियासी सफर तो बहुत लोग जान रहे होंगे लेकिन उनके निजी जिंदगी की कहानी से अभी भी बहुत लोग परिचित नहीं है. आइए जानते हैं, शुभेंदु अधिकारी के निजी जीवन से जुड़ी अहम जानकारियां.
1970 में पूर्वी मेदिनीपुर में जन्म
शुभेंदु अधिकारी का जन्म 15 दिसंबर 1970 को पूर्वी मेदिनीपुर के कांथी में एक समृद्ध राजनीतिक परिवार में हुआ था. उनके पिता, शिशिर अधिकारी भी राजनीति में सक्रिय रहे हैं. शिशिर अधिकारी तीन बार के सांसद हैं. शिशिर अधिकारी पहली बार साल 2009 की 15वीं लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए, इसके बाद साल 2014 की 16वीं लोकसभा और साल 2019 17वीं लोकसभा के लिए फिर चुने गए.
शुभेंदु अधिकारी के पिता शिशिर अधिकारी ने सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय की सलाहकार समिति, ग्रामीण विकास और पंचायती राज संबंधी स्थायी संसदीय समिति के सदस्य की भूमिका निभाई. शुभेंदु अधिकारी की मां का नाम गायत्री अधिकारी है.
छात्र नेता के तौर पर शुरू हुआ सियासी सफर
1989 में शुभेंदु ने कांग्रेस की छात्र परिषद से अपना सफर शुरू किया. उस समय बंगाल में वामपंथी छात्र संगठनों का दबदबा था. विपक्षी छात्र नेता के रूप में उन्होंने कड़ी चुनौतियों का सामना किया. 1995 में कांथी नगर पालिका के पार्षद बनकर उन्होंने औपचारिक चुनावी राजनीति में कदम रखा. 1998 में ममता बनर्जी के तृणमूल कांग्रेस गठन के साथ ही अधिकारी परिवार टीएमसी से जुड़ गया.
नंदीग्राम आंदोलन बना टर्निंग प्वाइंट
सुवेंदु अधिकारी के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ 2007 का नंदीग्राम आंदोलन रहा. वामपंथी सरकार द्वारा किसानों की जमीन अधिग्रहण के फैसले के खिलाफ उन्होंने ‘भूमि उच्छेद प्रतिरोध कमेटी’ (BUPC) का गठन किया. ममता बनर्जी मीडिया और दिल्ली में आवाज उठा रही थीं, लेकिन नंदीग्राम की पगडंडियों पर असली लड़ाई शुभेंदु लड़ रहे थे.
वे रातों को गांवों में रुकते, स्थानीय भाषा में लोगों से बात करते और पुलिस-काडर के दबाव के खिलाफ किसानों की ढाल बने. 14 मार्च 2007 की पुलिस फायरिंग के बाद भी उन्होंने घायलों की मदद की और आंदोलन को मजबूत रखा. जानकार मानते हैं कि नंदीग्राम आंदोलन की सफलता में सुवेंदु की जमीनी भूमिका अहम थी, जिसने 2011 में 34 साल पुरानी वाम सरकार के पतन का रास्ता तैयार किया.
टीएमसी से बीजेपी तक का सफर
लंबे समय तक ममता बनर्जी के वफादार रहे सुवेंदु 2020-21 में पार्टी से दूर होते गए. 2021 के विधानसभा चुनाव में ममता ने अपनी सुरक्षित भवानीपुर सीट छोड़कर नंदीग्राम से सुवेंदु के खिलाफ चुनाव लड़ा, लेकिन शुभेंदु ने उन्हें हरा दिया.
यह जीत उनके करियर का टर्निंग पॉइंट साबित हुई. वे विपक्ष के नेता बने और बीजेपी के बंगाल चेहरे के रूप में उभरे. 2026 के चुनाव में उन्होंने संदेशखाली, आरजीकर और हावड़ा-उलबेरिया जैसे मुद्दों को उठाकर ममता सरकार को घेरा. पूरे बंगाल में कई यात्राएं कीं और टीएमसी की रणनीति को बेहतर समझते हुए बीजेपी की जीत में अहम योगदान दिया.
कैसा रहा व्यक्तिगत जीवन?
सुवेंदु अधिकारी अविवाहित हैं. वे उत्कल ब्राह्मण समुदाय से ताल्लुक रखते हैं. उनके परिवार की राजनीतिक पकड़ मजबूत है. हालांकि उनके ऊपर कई मुकदमे दर्ज हैं, जिन्हें वे राजनीतिक बदले की कार्रवाई बताते हैं. बंगाल में बीजेपी की पहली सरकार बनने जा रही है.
अब सवाल यह है कि नंदीग्राम के इस नायक को क्या भूमिका मिलेगी. क्या वे मुख्यमंत्री पद के दावेदार बनेंगे? शुभेंदु की यह यात्रा साबित करती है कि राजनीति में वफादारी और बगावत दोनों ही सत्ता बदल सकती हैं.
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