प्रदीप मालवीय, उज्जैन। सप्तपुरियों में एक अतिप्राचिन धर्म नगरी उज्जैन में स्थित मां हरसिद्धि मंदिर देश के 51 शक्तिपीठों में से एक है। जहां देवी सती की कोहनी गिरी थी। महाकाल वन क्षेत्र में रुद्रसागर के किनारे स्थित यह मंदिर राजा विक्रमादित्य की कुलदेवी को समर्पित है और यहां 51 फीट ऊंचे दो दीप स्तंभ मुख्य आकर्षण हैं। जहां प्रतिदिन संध्या के समय दीप-मालिकाएं प्रज्वलित की जाती है। यह स्थान तंत्र साधना और महालक्ष्मी-महासरस्वती के संयुक्त रूप के लिए प्रसिद्ध है।
11 बार कटवाया था सिर
सम्राट विक्रमादित्य माता हरसिद्धि के अनन्य भक्त थे। उन्होंने यहा 11 बार अपना शीश काटा था, जो माता की कृपा से पुनः जुड़ गया। लेकिन जब 12वीं बार उनका सिर नहीं जुड़ा तो माना गया उनका शासन सम्पूर्ण हो गया। यूं तो देशभर में हरसिद्धि देवी के कई प्रसिद्ध मंदिर है लेकिन वाराणसी और उज्जैन स्थित हरसिद्धि मंदिर सबसे प्राचीन है। कहा जाता है कि यह स्थान सम्राट विक्रमादित्य की तपोभूमि है। मंदिर के पीछे एक कोने में कुछ ‘सिर’ सिन्दूर चढ़े हुए रखे हैं। ये ‘विक्रमादित्य के सिर’ बताए जाते हैं।
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परमार वंशीय राजाओं की कुलदेवी
ऐसा माना जाता है कि महान सम्राट विक्रमदित्य ने देवी हरसिद्धि को प्रसन्न करने के लिए प्रत्येक 12वें वर्ष में अपने हाथों से अपने मस्तक की बलि दी थी। उन्होंने ऐसा 11 बार किया लेकिन हर बार उनका सिर वापस आ जाता था। 12वीं बार सिर नहीं आया तो समझा गया कि उनका शासन संपूर्ण हो गया। हालांकि उन्होंने 135 वर्षो तक शासन किया था। माता हरसिद्धि को परमार वंशीय राजाओं की कुलदेवी भी बताया जाता है।
यहां गिरी थी हाथ की कोहनी
कीवदंति के अनुसार, उज्जैन की रक्षा के लिए आस-पास देवियों का पहरा है, उनमें से एक हरसिद्धि देवी भी हैं। कहते हैं कि यह मंदिर वहां स्थित है जहां सती के शरीर का अंश अर्थात हाथ की कोहनी आकर गिरी थी। अत: इस स्थल को भी शक्तिपीठ के अंतर्गत माना जाता है। इस देवी मंदिर का पुराणों में भी वर्णन मिलता है। कहते हैं कि चण्ड और मुण्ड नामक दो दैत्यों ने अपना आतंक मचा रखा था। एक बार दोनों ने कैलाश पर कब्जा करने की योजना बनाई और वे दोनों वहां पहुंचे। दोनों जबरन अंदर प्रवेश करने लगे, तभी द्वार पर ही शिव के नंदीगण ने उन्हें रोका दिया।
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दैत्यों का वध
दोनों दैत्यों ने नंदीगण को शस्त्र से घायल कर दिया। शिवजी को जब यह पता चला तो उन्होंने तुरंत चंडीदेवी का स्मरण किया। देवी ने आज्ञा पाकर तत्क्षण दोनों दैत्यों का वध कर दिया। फिर उन्होंने शंकरजी के निकट आकर विनम्रता से वध का वृतांत सुनाया। इसके बाद शंकरजी ने खुश होकर कहा कि हे चण्डी, आपने दुष्टों का वध किया है इसलिए आपका नाम हरसिद्धि नाम से प्रसिद्ध होगा।
51 शक्तिपीठों में से एक
उज्जैन स्थित माता हरसिद्धि शक्तिपीठ में माता सती के दाहिने हाथ की कोहनी गिरी थी। मान्यता के अनुसार, भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र से खंडित होने के बाद देवी सती की दाहिनी कोहनी यहां शिप्रा नदी के तट पर गिरी थी, जिसके बाद यह 51 शक्तिपीठों में से एक प्रमुख शक्तिपीठ बनी।

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