अमित पांडेय, डोंगरगढ़। छत्तीसगढ़ के डोंगरगढ़ में इस बार नवरात्रि की पंचमी पर आस्था, परंपरा और इतिहास एक साथ देखने को मिला। आदिवासी गोंड समाज की सदियों पुरानी पंचमी भेंट यात्रा पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ संपन्न हुई। इस बार यात्रा की सबसे खास बात यह रही कि समाज के लोग खैरागढ़ राजपरिवार से जुड़ी राजा की प्राचीन तलवार को लेकर माता के दरबार पहुंचे।

माता बम्लेश्वरी मंदिर में उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़, 601 किलो फलों से सजा मंदिर

नवरात्रि की पंचमी तिथि पर माँ बम्लेश्वरी मंदिर में सुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ने लगी थी। छोटी माँ बम्लेश्वरी मंदिर को 601 किलो फलों से सजाया गया, जिससे मंदिर का दृश्य बेहद आकर्षक और भव्य नजर आया। गोंड समाज के सैकड़ों लोग पारंपरिक वेशभूषा में शामिल हुए और ढोल-नगाड़ों के साथ भेंट यात्रा निकालते हुए मंदिर पहुंचे।

बूढ़ादेव स्थल से निकली भेंट यात्रा, विधि-विधान से हुई पूजा

यह यात्रा बूढ़ादेव देव स्थल से शुरू हुई, जो गोंड समाज के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र है। वहां से जुलूस के रूप में लोग माता बम्लेश्वरी मंदिर पहुंचे। मंदिर पहुंचने के बाद समाज के प्रतिनिधि किशोर नेताम और बैगा ने गर्भगृह में जाकर पूरे विधि-विधान से पूजा-अर्चना की और माता को भेंट अर्पित की।

कड़ी सुरक्षा के बीच शांतिपूर्ण आयोजन, अधिकारियों ने संभाली व्यवस्था

पूरे आयोजन के दौरान प्रशासन की ओर से कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की गई थी। पुलिस अधीक्षक अंकिता शर्मा खुद मौके पर मौजूद रहीं और व्यवस्थाओं का जायजा लेती रहीं। वहीं एसडीएम एम. भार्गव सहित अन्य अधिकारी भी लगातार मंदिर परिसर में मौजूद रहे। प्रशासन, ट्रस्ट और समाज के आपसी सहयोग से कार्यक्रम शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हुआ।

सदियों पुरानी परंपरा, गोंड समाज की आस्था और पहचान से जुड़ी

गोंड महासभा के अध्यक्ष रमेश उइके ने बताया कि पंचमी भेंट की यह परंपरा बहुत पुरानी है और हर साल दोनों नवरात्र में इसे निभाया जाता है। उन्होंने कहा कि यह परंपरा समाज की आस्था और पहचान से जुड़ी हुई है, जिसे आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाया जा रहा है।

इतिहास से जुड़ी परंपरा: भोसले काल से जुड़ी कहानी

डोंगरगढ़ की इस परंपरा के पीछे एक दिलचस्प इतिहास भी जुड़ा हुआ है। माना जाता है कि भोसले शासनकाल के समय डोंगरगढ़ के राजा घासीदास वैष्णव ने नागपुर को कर देने से इनकार कर दिया था। इसके बाद नागपुर दरबार ने अपने दीवान टिकैत राय को डोंगरगढ़ पर आक्रमण करने का आदेश दिया। टिकैत राय ने युद्ध में जीत हासिल की और राजा घासीदास को बंदी बना लिया।

खैरागढ़ राजपरिवार के पास सुरक्षित है माँ बम्लेश्वरी की प्राचीन तलवार

राजा घासीदास वैष्णव की वीरता से प्रभावित होकर उन्हें खैरागढ़ सहित डोंगरगढ़ का शासन सौंप दिया गया। इसी दौरान उन्हें माँ बम्लेश्वरी की प्राचीन तलवार भी दी गई, जो आज भी खैरागढ़ राजपरिवार के पास सुरक्षित है। यह तलवार धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। खास बात यह है कि इस तलवार पर माता बम्लेश्वरी की आकृति भी बनी हुई बताई जाती है।

ट्रस्ट के जरिए संचालित मंदिर, राजपरिवार निभा रहा परंपरा

आजादी के बाद खैरागढ़ राजपरिवार के वीरेन्द्र बहादुर सिंह ने मंदिर के संचालन के लिए ट्रस्ट की स्थापना की, जो आज भी मंदिर की व्यवस्था संभालता है। राजपरिवार के राजकुमार भवानी बहादुर के अनुसार, यह तलवार सैकड़ों वर्ष पुरानी है और राजपरिवार ने इसे करीब दो सौ वर्षों से सुरक्षित रखा है। पंचमी भेंट के मौके पर इसे मंदिर लाना परंपरा का अहम हिस्सा है।

आस्था और विरासत का संगम, नई पीढ़ी को जोड़ रहा आयोजन

एसडीएम एम. भार्गव ने बताया कि पंचमी भेंट का कार्यक्रम सफलतापूर्वक संपन्न हुआ है और इसमें प्रशासन, पुलिस, ट्रस्ट और समाज के लोगों का सराहनीय योगदान रहा। डोंगरगढ़ की यह पंचमी भेंट यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आदिवासी गोंड समाज की आस्था, उनकी परंपरा और क्षेत्र के गौरवशाली इतिहास का जीवंत उदाहरण है। हर साल यह आयोजन न सिर्फ श्रद्धा का केंद्र बनता है, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी जड़ों और विरासत से जोड़ने का काम भी करता है।

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