पवन राय, मंडला। मध्यप्रदेश के मंडला में गोंडवाना साम्राज्य की कुलदेवी मां राजराजेश्वरी का प्राचीन मंदिर चैत्र नवरात्रि में भक्ति का केंद्र बना हुआ है, जहां श्रद्धा के साथ इतिहास भी सांस लेता है। कहा जाता है – जहां श्रद्धा होती है, वहीं अटूट विश्वास जन्म लेता है। कुछ ऐसा ही नजारा इन दिनों मंडला के ऐतिहासिक किला वार्ड में देखने को मिल रहा है, जहां स्थित गोंड राजवंश की आराध्या कुलदेवी मां राजराजेश्वरी का प्राचीन मंदिर। चैत्र नवरात्रि पर भजन-कीर्तन, विशेष आरती और मंगला दर्शन के साथ पूरा मंदिर परिसर भक्तिमय वातावरण में डूबा हुआ है।

तलवार ही उनके विजय और पराजय का संकेत देती थी

प्राचीन राज राजेश्वरी मंदिर में देवी की स्थापना 1749 में गौड़ राजा निजाम शाह द्वारा की गई थी। किंवदंती के अनुसार मां राजराजेश्वरी ने राजा को स्वप्न में दर्शन देकर यहां अपनी स्थापना का आदेश दिया था। युद्ध पर जाने से पहले राजा अपनी तलवार माता के चरणों में अर्पित करते थे। और मान्यता थी कि तलवार ही उनके विजय और पराजय का संकेत देती थी। यह मंदिर सिर्फ आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि गोंडवाना की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक भी है। विशाल चबूतरे पर बना गुम्बदाकार शिखर, नक्काशीदार झरोखे और कंगूरेदार छत इसकी भव्यता को दर्शाते हैं।

गर्भगृह में मां राजराजेश्वरी के साथ महादुर्गा और महालक्ष्मी विराजमान

गर्भगृह में मां राजराजेश्वरी के साथ महादुर्गा और महालक्ष्मी विराजमान हैं, जबकि परिक्रमा पथ पर प्राचीन काल की दुर्लभ मूर्तियां आज भी इतिहास की गवाही देती हैं। मां नर्मदा नदी के समीप स्थित यह मंदिर आज भी श्रद्धा का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। गोंड समाज के लोग बड़ी संख्या में यहां पहुंचकर अपनी कुलदेवी और पूर्वजों की पूजा-अर्चना करते हैं। कन्या पूजन, महाआरती और विशेष श्रृंगार के साथ पूरा मंदिर क्षेत्र आस्था के रंग में रंगा हुआ है।

बहादुर सिंगराम, गौड़ वंशज

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