पारद शिवलिंग और शालिग्राम की पूजा का विशेष महत्व पुराणों में विस्तार से बताया गया है. हिन्दू धर्म में इन दोनों को अत्यंत पवित्र और दिव्य माना जाता है. पारद यानी पारा, शास्त्रों के अनुसार भगवान शिव का साक्षात रूप माना जाता है. इसकी उत्पत्ति शिव के दिव्य तेज से मानी गई है. खास तौर पर शुद्ध पारद से बने शिवलिंग की पूजा को बहुत ही फलदायी बताया गया है.

पारद शिवलिंग की पूजा करने से व्यक्ति को अनेक यज्ञ, दान और तीर्थ करने के बराबर पुण्य प्राप्त होता है. शिवपुराण में उल्लेख मिलता है कि इसके दर्शन और स्पर्श मात्र से पाप नष्ट होते हैं और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है. जिस घर में नियमित रूप से पारद शिवलिंग की पूजा होती है, वहां सुख-समृद्धि, रिद्धि-सिद्धि और लक्ष्मी का वास होता है. साथ ही, घर के वास्तुदोष भी धीरे-धीरे समाप्त हो जाते हैं.
इसी तरह शालिग्राम को भगवान विष्णु का स्वयं प्रकट स्वरूप माना गया है. ये काले, चिकने और अंडाकार पत्थर नेपाल की गंडकी नदी में पाए जाते हैं, जिन पर शंख और चक्र जैसे चिन्ह दिखाई देते हैं. स्वयंभू होने के कारण इनमें प्राण-प्रतिष्ठा की आवश्यकता नहीं होती. शालिग्राम की पूजा तुलसी के बिना अधूरी मानी जाती है. तुलसी अर्पित करने से भगवान विष्णु जल्दी प्रसन्न होते हैं.शालिग्राम और तुलसी विवाह का भी विशेष धार्मिक महत्व है, जिसे करने से जीवन के अनेक दोष और कष्ट दूर होते हैं.
पुराणों में यह भी कहा गया है कि जिस घर में शालिग्राम की पूजा होती है, वह स्थान किसी तीर्थ के समान पवित्र हो जाता है. इसके अभिषेक का जल यानी चरणामृत ग्रहण करने से मन, शरीर और धन से जुड़े दोषों में कमी आती है. ऐसा भी विश्वास है कि जीवन के अंतिम समय में इसका सेवन करने से व्यक्ति को विष्णुलोक की प्राप्ति होती है. इस प्रकार पारद शिवलिंग और शालिग्राम दोनों ही भक्ति, साधना और आध्यात्मिक उन्नति के महत्वपूर्ण प्रतीक हैं, जो जीवन में सुख, शांति और अंततः मोक्ष प्रदान करने वाले माने गए हैं.
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