Dharm Desk : हिंदू परंपराओं में कई ऐसी बातें हैं जो रोज दिखती तो हैं, लेकिन उनके पीछे का कारण हर किसी को नहीं पता होता. शादी-विवाह में आपने देखा होगा कि कभी पत्नी-पति के बाईं ओर बैठती है तो कभी दाईं ओर…. ये कोई यूं ही बनी परंपरा नहीं है, इसके पीछे शास्त्रों का आधार बताया जाता है.

स्त्री वामांगी क्यों कहलाती है
मान्यता है कि सृष्टि की रचना करते समय ब्रह्मा जी के दाएं भाग से पुरुष और बाएं भाग से स्त्री की उत्पत्ति हुई. इसी वजह से स्त्री को वामांगी कहा गया. यही कारण है कि शादी के बाद सामान्य जीवन में पत्नी को पति के बाएं तरफ बैठाया जाता है. चाहे भोजन हो, आशीर्वाद लेना हो या फिर घर के कामकाज, ज्यादातर समय पत्नी बाईं ओर ही रहती है.
सप्तपदी से पहले बदल जाती है जगह
विवाह के दौरान एक बात थोड़ी अलग दिखती है. सप्तपदी यानी सात फेरे होने से पहले वधू को दाईं ओर बैठाया जाता है. ऐसा माना जाता है कि उस समय तक वह पूरी तरह पत्नी के रूप में स्थापित नहीं होती. फेरे और वचन पूरे होने के बाद ही उसका स्थान बदलकर बाईं ओर किया जाता है.
इन धार्मिक कामों में दाईं ओर बैठती है पत्नी
यज्ञ, कन्यादान, नामकरण, अन्नप्राशन जैसे संस्कारों में पत्नी को दाईं ओर बैठाने की परंपरा है. कहा जाता है कि ये कर्म थोड़ा अलग तरह के होते हैं, जिन्हें पुरुष प्रधान माना गया है, इसलिए यहां नियम भी बदल जाता है.
सांसारिक कामों में बाईं ओर का महत्व
घर-परिवार से जुड़े काम, जैसे रोजमर्रा की जिंदगी के फैसले या परंपराएं, इन्हें स्त्री प्रधान माना गया है. इसी वजह से इन कामों में पत्नी का बाईं ओर रहना शुभ माना जाता है. कई लोग इसे शिव के अर्धनारीश्वर रूप से भी जोड़कर देखते हैं.
पत्नी का सम्मान जरूरी
धार्मिक ग्रंथों में भी पत्नी को घर की लक्ष्मी कहा गया है. अगर वह खुश रहे तो घर में बरकत बनी रहती है. यही वजह है कि इन परंपराओं को आज भी लोग निभाते आ रहे हैं. भले ही कई बार वजह साफ समझ में ना आए.
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