हेमंत शर्मा, इंदौर। धार की भोजशाला को लेकर इंदौर हाईकोर्ट में बुधवार को सुनवाई के दौरान हिंदू पक्ष ने आक्रामक अंदाज में अपनी दलीलें रखीं। अदालत के सामने ऐसे तथ्य पेश किए गए, जिनमें इतिहास, वास्तुशास्त्र, पुरातत्व और धार्मिक कानून- सभी को आधार बनाया गया। सबसे पहले हिंदू पक्ष ने न्यायालय को बताया कि भोजशाला परिसर से जो मां वागदेवी की मूर्ति मिली थी, उसके पेडेस्टल पर साफ लिखा है कि यह मूर्ति मां वागदेवी की है और इसकी प्राण प्रतिष्ठा राजा भोज की ओर से वर्ष 1034 में कराई गई थी। इसे सीधे तौर पर मंदिर होने का प्रमाण बताया गया। इसके बाद हिंदू पक्ष ने गजेटियर, ऐतिहासिक किताबों के विवरणों का हवाला दिया। अदालत को बताया गया कि किसी भी स्थल के इतिहास को समझने के लिए ये दस्तावेज कानूनी रूप से मान्य होते हैं। यही नहीं इनका उपयोग राम मंदिर निर्णय में भी किया गया था, जहां गजेटियर और यात्रियों के विवरण को साक्ष्य माना गया।

राजा भोज के ग्रंथ से मिला बड़ा आधार

बहस का सबसे अहम और तीखा हिस्सा रहा राजा भोज के लिखे गए प्रसिद्ध ग्रंथ समरांगण सूत्रधार का उल्लेख। हिंदू पक्ष ने बताया कि इस ग्रंथ में स्पष्ट लिखा है कि मंदिर का निर्माण 4:6 के अनुपात में होना चाहिए। यानी चौड़ाई 4 और लंबाई 6 के अनुपात में। अदालत को बताया गया कि भोजशाला की इमारत का माप (लगभग 57, 45 और 38.41 मीटर) इसी अनुपात से मेल खाता है। यानी जिस तरह का मंदिर राजा भोज ने अपने ग्रंथ में बताया, उसी पैटर्न पर यह संरचना खड़ी है।

यज्ञशाला और हवन कुंड भी मंदिर का प्रमाण

हिंदू पक्ष ने यह भी कहा कि समरांगण सूत्रधार में मंदिर के बीच में यज्ञशाला और हवन कुंड का जिक्र है, जो चौकोर आकार का और विशेष अनुपात में होना चाहिए। भोजशाला में मौजूद बीच की चौकोर आकृति को इसी यज्ञशाला और हवन कुंड से जोड़ा गया। यह भी बताया गया कि पूरी इमारत पत्थरों की बनी है, लेकिन बीच का हिस्सा ईंटों का है, जो हवन कुंड की पहचान है। इतना ही नहीं, एएसआई रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा गया कि नींव और हवन कुंड की ईंटें एक ही स्रोत की हैं, जिससे साफ होता है कि यह संरचना एक ही समय में बनी और यह कोई बाद में जोड़ा गया हिस्सा नहीं है।

मूर्ति विज्ञान से भी मंदिर होने का दावा

मां वाग देवी की मूर्ति, जो फिलहाल लंदन के संग्रहालय में रखी है, उसकी शैली का भी जिक्र किया गया। बताया गया कि यह मूर्ति मंदसौर के हिंगलाजगढ़ और रायसेन क्षेत्र से मिली परमारकालीन मूर्तियों से पूरी तरह मेल खाती है। यानी जिस तरह की मूर्तियां मंदिरों में मिलती हैं, वैसी ही यह मूर्ति भी है।

धार्मिक कानूनों क्या कहता है

हिंदू पक्ष ने अदालत में यह भी तर्क दिया कि हिंदू धर्म में एक बार किसी स्थान पर देवता की प्राण प्रतिष्ठा हो जाए, तो वह स्थल हमेशा मंदिर ही माना जाता है। चाहे बाद में संरचना बदल दी जाए। वहीं इस्लामी कानून का हवाला देते हुए कहा गया कि अगर किसी जमीन पर अवैध कब्जा कर मस्जिद बनाई जाती है, तो वह मस्जिद वैध नहीं मानी जाती और वहां नमाज भी मान्य नहीं होती।

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