आम आदमी पार्टी से जुड़े कथित शराब घोटाले मामले में पार्टी प्रमुख अरविंद केजरीवाल (Arvind Kejriwal) द्वारा जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा(Swarn Kanta Sharma) की अदालत का बहिष्कार किए जाने के बाद अब अन्य आरोपी भी इसी रुख पर चलते दिख रहे हैं। पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया (Manish Sisodiya) के बाद अब AAP नेता दुर्गेश पाठक(Durgesh Pathak) ने भी जस्टिस शर्मा के खिलाफ तथाकथित “लेटर नंबर-3” लिखते हुए उनकी अदालत में पेश न होने की बात कही है। दुर्गेश पाठक ने भी केजरीवाल और सिसोदिया की तरह अदालत पर सवाल उठाते हुए वहां न जाने का निर्णय जताया है।
जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा, जो दिल्ली उच्च न्यायालय की जज हैं, इस मामले में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) की याचिका पर सुनवाई कर रही हैं। इससे पहले, फरवरी के अंत में ट्रायल कोर्ट ने अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया समेत सभी 23 आरोपियों को आरोपमुक्त कर दिया था। ट्रायल कोर्ट ने अपने फैसले में जांच एजेंसी की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी करते हुए जांच अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश भी दिए थे। ट्रायल कोर्ट के इस फैसले को चुनौती देते हुए केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो ने हाई कोर्ट का रुख किया, जिसके बाद अब इस पूरे मामले की सुनवाई जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की बेंच में चल रही है।
कथित शराब नीति मामले में सुनवाई के दौरान अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी के कुछ नेताओं ने जज स्वर्ण कांता शर्मा को लेकर पक्षपात की आशंका जताई है। केजरीवाल ने आरोप लगाया कि इस मामले में “हितों का टकराव” (conflict of interest) हो सकता है। उनके मुताबिक, जस्टिस शर्मा के परिजन केंद्र सरकार के वकीलों के पैनल से जुड़े हैं, और तुषार मेहता जो इस मामले में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) की ओर से पेश हो रहे सॉलिसिटर जनरल हैं ही केसों का आवंटन करते हैं। इस आधार पर उन्होंने निष्पक्ष सुनवाई को लेकर चिंता व्यक्त की।
हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि इस तरह के आरोप न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा बनते हैं और अदालत स्वयं ऐसे मुद्दों पर निर्णय लेती है जैसे कि जज का मामले से अलग होना (recusal) या सुनवाई जारी रखना। आमतौर पर, केवल आरोप भर से न्यायिक निष्पक्षता पर अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला जाता; अदालत तथ्यों और कानूनी मानकों के आधार पर ही निर्णय करती है।
दुर्गेश पाठक ने भी किया बहिष्कार
अरविंद केजरीवाल द्वारा “सत्याग्रह” बताते हुए शुरू किए गए बहिष्कार में अब मनीष सिसोदिया और दुर्गेश पाठक भी शामिल हो गए हैं। मनीष सिसोदिया ने केजरीवाल के आरोपों को दोहराते हुए कहा कि उन्हें जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा से निष्पक्ष न्याय की उम्मीद नहीं है। वहीं दुर्गेश पाठक ने भी इसी लाइन पर चलते हुए ऐलान किया कि उनकी ओर से कोई वकील जस्टिस शर्मा की अदालत में पेश नहीं होगा। यह कदम “सत्याग्रह” के तौर पर पेश किया जा रहा है, लेकिन कानूनी दृष्टि से यह असामान्य स्थिति मानी जाती है, क्योंकि अदालत की कार्यवाही में भाग लेना न्यायिक प्रक्रिया का अहम हिस्सा होता है। यदि कोई पक्ष अदालत में पेश नहीं होता, तो न्यायालय अपने अधिकारों के तहत एकतरफा सुनवाई भी आगे बढ़ा सकता है।
बहिष्कार वाली सत्याग्रह मुहिम केजरीवाल ने की शुरू
अरविंद केजरीवाल ने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की अदालत के बहिष्कार को “सत्याग्रह” का नाम दिया है। एक दिन पहले केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और अन्य नेताओं के साथ राजघाट पहुंचे, जहां उन्होंने महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि दी। मीडिया से बातचीत में केजरीवाल ने कहा कि वे न्यायपालिका का सम्मान करते हैं, लेकिन कुछ परिस्थितियों के चलते उन्हें यह कदम उठाना पड़ा। दरअसल, उनकी रिक्यूजल (जज को मामले से अलग करने) की याचिका खारिज होने के बाद आम आदमी पार्टी के नेताओं ने यह रुख अपनाया है। इसके बाद से इस पूरे मुद्दे पर नई बहस छिड़ गई है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने इस कदम को अदालत की अवमानना जैसा बताया है और इसे न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने वाला बताया। वहीं आम आदमी पार्टी (AAP) के नेताओं का कहना है कि उनके पास न्याय पाने के लिए कोई अन्य विकल्प नहीं बचा था, इसलिए उन्होंने गांधीवादी “सत्याग्रह” का रास्ता चुना।
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