अरावली की पहाड़ियों (Aravalli Hills) में बने कुछ धार्मिक स्थलों के खिलाफ अब वन विभाग ने कड़ा रुख अपनाया है। विभाग ने अवैध निर्माणों को हटाने के लिए 15 दिन का अल्टीमेटम जारी किया है। यदि तय समय के भीतर निर्माण हटाए नहीं गए, तो वन विभाग द्वारा कानूनी कार्रवाई की जाएगी। सूत्रों के अनुसार, विभाग ने मंदिर परिसर में दो नोटिस चस्पा कराए हैं और स्थानीय लोगों को भी अवैध निर्माण हटाने के आदेश दिए हैं।

अरावली की पहाड़ियों में बने अवैध धार्मिक और अन्य निर्माणों को हटाने के लिए वन विभाग ने एक बार फिर कड़ा रुख अपनाया है। पिछले वर्ष जून-जुलाई में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर विभाग ने बुलडोजर अभियान चलाया था, जिसमें लक्कड़पुर, अनंगपुर, अनखीर और मेवला महाराजपुर क्षेत्रों में 261.06 एकड़ में फैले 241 अवैध निर्माणों को तोड़ा गया था। वन विभाग के अधिकारियों ने बताया कि उस अभियान के दौरान गांव अनंगपुर में तोड़फोड़ की कार्रवाई में काफी कठिनाई आई थी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर केंद्रीय पर्यावरण आयोग (CEC) गठित किया गया था, जिसने मौके का मुआयना कर अपनी रिपोर्ट कोर्ट में पेश की थी।

जानकारी के अनुसार, अरावली में कुल 780.26 एकड़ जमीन पर अवैध निर्माण मौजूद हैं। वन विभाग ने अब अवैध निर्माणों को 15 दिन में हटाने का अल्टीमेटम जारी किया है। विभाग ने कहा है कि यदि समय पर निर्माण नहीं हटाए गए, तो कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

15 दिन का दिया समय

वन विभाग ने 26 फरवरी को फरीदाबाद के अरावली क्षेत्र में स्थित कुछ धार्मिक स्थलों के अवैध निर्माणों के खिलाफ नोटिस जारी किया है। नोटिस में कहा गया है कि इन धार्मिक स्थलों में बनाए गए ढांचे पीएलपीए (PLPA) एक्ट का उल्लंघन करते हैं। वन विभाग ने स्पष्ट किया है कि अरावली क्षेत्र का उद्देश्य केवल पौधे लगाने और पर्यावरण संरक्षण है, इसलिए किसी भी प्रकार का निर्माण यहां गैर-कानूनी है। नोटिस में अवैध संरचनाओं को 15 दिन के भीतर हटाने का अल्टीमेटम दिया गया है।

अरावली में अतिक्रमण-अवैध खनन से जलवायु संतुलन पर गंभीर असर : रिपोर्ट

केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव द्वारा जनवरी 2026 में जारी की गई एक स्टडी रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि अरावली पर्वतमाला में अतिक्रमण, वनों की कटाई, अवैध खनन और शहरी बुनियादी ढांचे के विस्तार ने भूजल पुनर्भरण, जैव विविधता, वायु गुणवत्ता और जलवायु संतुलन पर गंभीर प्रभाव डाला है।

रिपोर्ट में बताया गया है कि 1980 के दशक से पहले, विशेषकर सरिस्का और बरदोद वन्यजीव अभयारण्यों के आसपास वन भूमि में बड़े पैमाने पर बदलाव हुआ, जिससे प्राकृतिक वन आवरण में भारी गिरावट आई। इसका परिणाम यह हुआ कि महत्वपूर्ण वन्यजीव आवास और जलग्रहण क्षेत्र विखंडित हो गए। इस अध्ययन का उद्देश्य अरावली परिदृश्य के पारिस्थितिक पुनर्स्थापन के उपायों का मूल्यांकन करना था। यह शोध सांकला फाउंडेशन द्वारा भारत में डेनमार्क दूतावास और हरियाणा राज्य वन विभाग के सहयोग से किया गया।

हाल ही में जारी अध्ययन में अरावली क्षेत्र में पारिस्थितिक गिरावट को रोकने और सुधारने के लिए एक एकीकृत दृष्टिकोण अपनाने की सिफारिश की गई है। इस दृष्टिकोण में पर्यावरणीय स्थिरता को जैव विविधता संरक्षण, जलवायु लचीलापन, आजीविका सुरक्षा और मानवाधिकारों के साथ जोड़ा गया है। अरावली पर्वतमाला, जो विश्व की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) और सिंधु-गंगा मैदानों के लिए एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक अवरोध के रूप में कार्य करता है। यह क्षेत्र स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को बनाए रखकर भूजल पुनर्भरण, जल संरक्षण और जीवन-निर्वाह में महत्वपूर्ण योगदान देता है।

रिपोर्ट में इन पर जताई चिंता

अरावली पर्वतमाला का नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र, जो चार राज्यों और 29 जिलों में फैला है और 5 करोड़ से अधिक लोगों का घर है, वनों की कटाई, तेजी से शहरीकरण, अस्थिर भूमि उपयोग और भूमि क्षरण तथा मरुस्थलीकरण के कारण गंभीर खतरे में है। अध्ययन में कहा गया है कि अतिक्रमण, अवैध खनन और शहरी अवसंरचना का विस्तार अरावली की भूजल पुनर्भरण क्षमता, जैव विविधता, वायु गुणवत्ता और जलवायु विनियमन पर गंभीर असर डाल रहा है। इसके परिणामस्वरूप, अरावली की हरित अवरोध के रूप में कार्य करने की क्षमता कमजोर हुई है, जिससे मरुस्थलीकरण में तेजी आई है और उत्तरी मैदानों की पारिस्थितिकी स्थिरता को खतरा पैदा हुआ है।

संकला फाउंडेशन ने गुरुग्राम के अरावली क्षेत्र में चार गांवों को चुनकर स्थल-विशिष्ट, साक्ष्य-आधारित और समुदाय-समावेशी पारिस्थितिकी बहाली मॉडल लागू किया है। यह मॉडल जिले के दक्षिणी भाग पर केंद्रित है और इन पर्यावरणीय चुनौतियों का समाधान करने के लिए एक व्यवहारिक दृष्टिकोण प्रदान करता है।

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