दिल्ली पुलिस में सिपाही बनने के लिए चयनित एक युवक, जिसके खिलाफ नाबालिग रहते मुकदमा दर्ज था, अब अपने पद पर भर्ती हो सकेगा। पहले दिल्ली पुलिस ने चयन प्रक्रिया पूरी होने के बावजूद मुकदमे के चलते उसे भर्ती देने से इनकार कर दिया था। युवक ने इस फैसले के खिलाफ केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (कैट) का दरवाजा खटखटाया। कैट ने युवक के पक्ष में फैसला सुनाते हुए आदेश दिया कि उसे चयन वर्ष से ही भर्ती दिया जाए। हालांकि, उसका वेतन तब से मिलेगा जब वह आधिकारिक तौर पर नौकरी शुरू करेगा।
मुज्जफरनगर निवासी विनोद (बदला हुआ नाम) ने वर्ष 2023 में दिल्ली पुलिस द्वारा निकाली गई सिपाही भर्ती में हिस्सा लिया था। आवेदन के समय उसने ईमानदारी से बताया कि उसके खिलाफ शामली के एक थाने में वर्ष 2018 में मारपीट और चोट पहुंचाने की एफआईआर दर्ज है। विनोद ने सिपाही पद के लिए आयोजित लिखित और शारीरिक परीक्षा सफलतापूर्वक पास कर ली। इसके बाद अप्रैल 2024 में दिल्ली पुलिस ने उसे उक्त एफआईआर को लेकर “कारण बताओ” नोटिस जारी किया। युवक ने नोटिस के जवाब में संबंधित दस्तावेज जमा किए, जिनमें वर्ष 2022 में अदालत से बरी होने का आदेश भी शामिल था।
इसके बावजूद दिल्ली पुलिस ने उसे भर्ती देने से इनकार कर दिया। युवक ने इस फैसले के खिलाफ केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (कैट) का दरवाजा खटखटाया। कैट ने फैसला सुनाते हुए आदेश दिया कि नाबालिग रहते किसी मुकदमे का सामना करना वर्तमान भर्ती में बाधा नहीं बनता। युवक को चयन वर्ष से ही दिल्ली पुलिस में भर्ती दिया जाएगा। हालांकि, उसका वेतन नौकरी शुरू करने के बाद ही मिलेगा।
अदालत ने बेगुनाह माना
युवक के अधिवक्ता अनिल सिंगल ने कैट में बताया कि एफआईआर दर्ज होने के समय आवेदनकर्ता की उम्र केवल 17 वर्ष थी। अदालत में सुनवाई के दौरान गवाह ने ना तो उसे पहचाना और ना ही उसके खिलाफ कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत किए। अदालत ने उसे बरी करने के साथ ही शिकायतकर्ता के खिलाफ कार्रवाई करने के निर्देश भी दिए थे।
दिल्ली पुलिस ने तैनात करने से इनकार कर दिया
दिल्ली पुलिस की तरफ से कैट को बताया गया कि युवक आरोप से इसलिए बरी हुआ क्योंकि गवाह अपने बयान से मुकर गया। आरोपपत्र में बताया गया था कि यह एफआईआर अकेले युवक पर दर्ज हुई थी और इसमें भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 308 जैसा गंभीर आरोप शामिल था। पुलिस का तर्क था कि इसी कारण युवक को भर्ती नहीं किया जा सकता। इसके बावजूद कैट ने फैसला सुनाते हुए कहा कि नाबालिग रहते किसी मुकदमे का सामना करना वर्तमान भर्ती में बाधा नहीं बनता। युवक को चयन वर्ष से ही दिल्ली पुलिस में भर्ती दिया जाएगा, जबकि वेतन नौकरी शुरू करने के बाद ही मिलेगा।
आठ सप्ताह के भीतर नियुक्ति देने का आदेश
केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि इस बात पर कोई विवाद नहीं है कि एफआईआर के समय आवेदक नाबालिग था। कानून के अनुसार नाबालिग पर दर्ज मामले को अलग तरीके से देखा जाना चाहिए। कैट ने कहा कि इस मामले में अदालत ने उसे बरी कर दिया है, इसलिए केवल संदेह के आधार पर उसे गलत नहीं माना जा सकता। कैट ने आदेश दिया कि दिल्ली पुलिस युवक को सिपाही के पद पर आठ सप्ताह के भीतर नियुक्त करे, जबकि वेतन उसे तब से मिलेगा जब वह आधिकारिक तौर पर नौकरी शुरू करेगा।
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