नक्सलवाद, यह शब्द भारतीय नहीं है हालांकि नक्सलबाड़ी पश्चिम बंगाल की सीमाओं के भीतर ही स्थित है, लेकिन उस नक्सलबाड़ी में उपजी यह अलोकतांत्रिक विचारधारा चीन के माओवाद को भारत के लोकतंत्र पर थोपने की एक गहरी साजिश थी। ग्रामीण भारत में भूमि संबंधित कानून, सामाजिक न्याय और आर्थिक असमानता को राजनीतिक हथियार बनाकर माओ समर्थक चारु मजूमदार, कानू सान्याल, जंगल संथाल जैसे लोगों ने किसानों को लोकतांत्रिक व्यवस्था के विरुद्ध एकजुट किया और उन्हें सशस्त्र क्रांति के लिए प्रेरित करना प्रारंभ किया। यह कोई जनमानस का आंदोलन नहीं था बल्कि एक आयातित विचारधारा से भारत की व्यवस्था, अखंडता और संप्रभुता को खंडित करने की साजिश थी और इस साजिश में भोले-भाले ग्रामीण और आदिवासियों को षड्यंत्र बनाकर शामिल किया गया।
यद्यपि नक्सलबाड़ी में यह विद्रोह लगभग 72 दिनों में समाप्त हो गया, पर यह विचारधारा बिहार, आंध्र प्रदेश, उड़ीसा और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में तेज़ी से फैली और यहाँ से भारत में नक्सलवाद को “पशुपति से तिरुपति तक” रेड कॉरिडोर बनाने का अभियान शुरू किया गया। नक्सलियों ने उन राज्यों का चुनाव किया जहां उनके छिपने के लिए जंगल हो, जो क्षेत्र सरकार की प्राथमिकताओं से दूर हों और जहां खनिज एवं वनोपज की भरमार हो। इसी क्रम में हमारा छत्तीसगढ़ जो 44% वनांचल से घिरा, साधारण परिवेश वाले आदिवासियों की भूमि रहा और तत्कालीन कांग्रेस की सरकार में अविभाजित मध्य प्रदेश का यह हिस्सा वन संपदा और खनिज संसाधनों से परिपूर्ण होने के बावजूद विकास के क्रम से बहुत दूर था।
यही कारण था कि नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ में अपनी पैठ बढानी शुरू की। जिसमें उन्हें सबसे बड़ा अवसर तब मिला जब तत्कालीन सरकार आदिवासियों के विरुद्ध खड़ी दिखी। 31 मार्च 1961 का लोहंडीगुड़ा गोलीकांड और 25 मार्च 1966 का जगदलपुर गोलीकांड बस्तर के इतिहास में वो निर्णायक मोड़ बने, जहाँ आदिवासी अस्मिता और शासन के बीच टकराव खुलकर सामने आया। बस्तर महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव द्वारा जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए उठाई गई आवाज को तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने दमन से जवाब दिया- पहले उन्हें पद से हटाकर बंदी बनाया गया, फिर आंदोलनों को गोलीबारी से कुचला गया। इन घटनाओं में 12 निर्दोष आदिवासियों की मौत और महाराजा की हत्या ने शासन के प्रति विश्वास को गहरा आघात पहुँचाया। परिणामस्वरूप बस्तर नेतृत्वविहीन हुआ और यही पीड़ा आगे चलकर नक्सलवाद के लिए उर्वर जमीन बन गई, जिसने वर्षों तक इस क्षेत्र को हिंसा और अस्थिरता की ओर धकेला।
एक तरफ बस्तर में नक्सलवाद अपनी जड़ें फैला रहा था तो दूसरी तरफ देश में तत्कालीन कांग्रेस सरकार के विरुद्ध भावनाएं बढ़ रही थी मुझे याद है जब देश में अटल जी के नेतृत्व वाली सरकार बनी और उन्होंने 1 नवंबर सन 2000 को छत्तीसगढ़ राज्य बनाया तब अगले 3 वर्षों तक छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार रही और वो दौर शासन की अस्थिरता और आतंक का पर्याय बना। बस्तर की जनता कांग्रेस की नीति से इतनी त्रस्त हो चुकी थी कि जब छत्तीसगढ़ में पहली बार विधानसभा के चुनाव हुए तब बस्तर की 12 विधानसभा सीटों पर 8 सीटें बस्तर के आदिवासियों ने भाजपा को जिताकर दीं और जब प्रदेश की जनता ने भारतीय जनता पार्टी पर विश्वास जताया एवं मुझे मुख्यमंत्री पद का दायित्व मिला तब हमारी सरकार के सामने केवल भूख, पलायन, बेरोजगारी और गरीबी ही समस्या नहीं थी बल्कि इन समस्याओं की जड़ में नक्सलवाद की विचारधारा भी समाहित थी। यह नक्सलवाद ही था जो छत्तीसगढ़ के विकास का अवरोध था।
हमारी सरकार छत्तीसगढ़ के संपूर्ण विकास को समर्पित थी, हमने बस्तर में 2 जिलों की संख्या को बढ़ाकर 7 जिलों तक पहुँचाया, जगदलपुर में सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल का निर्माण हो, नगरनार में 20 हजार करोड़ का स्टील प्लांट निर्मित करना हो या दंतेवाड़ा में जावांगा एजुकेशन सिटी बनाना हो हमनें निरंतर अधोसंरचना के कार्य पूरे किये। हमारी सरकार ने आदिवासियों को वन अधिकार पत्र वितरित करने से लेकर चरण पादुका तक और 1 रूपये किलो चावल से लेकर तेंदुपत्ता के समर्थन मूल्य तक अनेकों प्रयास से बस्तर को मुख्य धारा से जोड़ने काम किया।
एक तरफ हम विकास के लिए योजनाएँ बनाते थे तो दूसरी तरफ नक्सली उन योजनाओं को ध्वस्त कर देते थे। बस्तर में इंजरम-भेज्जी मार्ग जैसी अनेकों ऐसी सड़कें हैं, जिनके निर्माण को सुरक्षा बल के जवानों ने अपने खून से सींचा है और नक्सलियों ने ऐसे अनेकों विकास कार्यों को बाधित करने का काम किया है। मुझे याद है जब वर्ष 2008-09 में नक्सलियों द्वारा अबूझमाड़ के बारसूर में ट्रांसफॉर्मर उड़ा दिए जाने से पूरा क्षेत्र 12 दिनों तक पूर्ण ब्लैकआउट में डूब गया, जिससे बस्तर राजधानी से पूर्ण रूप से कट गया था।
मैंने स्वयं उस क्षेत्र में जाकर स्थिति का अवलोकन किया था और तब हमें यह बात समझ आ गयी थी कि अगर नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई जीतनी है तो जनविश्वास से जीती जा सकती है। मैं विशेष रूप से स्मरण करता हूँ स्व. महेंद्र कर्मा जी को, जिन्होंने इसी सोच से वर्ष 2005 में “सलवा जुडूम” जैसे स्वतः स्फूर्त जनआंदोलन को पूर्ण समर्थन दिया, जिस आन्दोलन ने आदिवासी समाज को भय के विरुद्ध खड़े होकर सुरक्षा बलों के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर अपने गाँवों को नक्सल प्रभाव से मुक्त कराने की ताकत दी। हालाँकि बाद में इस आंदोलन को सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रतिबंधित कर दिया गया, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने यह सिद्ध कर दिया कि नक्सलवाद के खिलाफ सबसे बड़ी ताकत जनता का विश्वास और सहभागिता है। इसी रणनीति के साथ सरगुजा की जागरूक जनता के सहयोग से हमारी सरकार ने छत्तीसगढ़ के एक बड़े भू-भाग सरगुजा को नक्सलवाद से पूर्णतः मुक्त कराने में सफलता हासिल की।
जब सर्वोच्च न्यायालय ने सलवा जुडूम को प्रतिबंधित किया, तब मैंने बस्तर के उन युवाओं के आंसू देखे थे, जो अपने भविष्य को लेकर चिंतित और व्यथित थे कि अब नक्सलियों के सामने उनके परिवार का क्या होगा? तब प्रदेश की सरकार ने बस्तर के उन युवाओं को यह स्पष्ट संदेश दिया कि भले ही परिस्थितियां कितनी भी विपरीत हों छत्तीसगढ़ की सरकार उन युवाओं को नक्सलियों के सामने अकेला नहीं छोड़ेगी। हमारी सरकार ने स्थानीय भूगोल, भाषा और सामाजिक संरचना से परिचित उन युवाओं को विशेष ट्रेनिंग देने के साथ ही नियमों को शिथिल करते हुए SPOs की भर्ती की। जिन्होंने बाद में DRG बटालियन में शामिल होकर नक्सलियों के सामने फ्रंट फुट पर लड़ाई लड़ी और आज यही युवा SI व TI जैसे पदों तक पहुंचे हैं। मैं स्मरण करना चाहता हूं भारतीय सेना के ब्रिगेडियर श्री पोन्वार जी को जिन्होंने कांकेर में स्थापित जंगल वारफेयर ट्रेनिंग सेंटर में 12 वर्षों तक अपनी सेवाएं दीं और सुरक्षा बल में भर्ती हुए नए जवानों को गोरिल्ला वार का प्रशिक्षण प्रदान किया, जिससे वह जंगल के भीतर घुसकर नक्सलियों के साथ लड़ाई लड़ सकें।
एक तरफ बस्तर के आदिवासी नक्सलियों से जूझ रहे थे, और प्रदेश की सरकार निरंतर नक्सलवाद के उन्मूलन के लिए कार्य कर रही थी, वहीं दूसरी ओर केंद्र की तत्कालीन यूपीए सरकार नक्सलवाद जैसी गंभीर चुनौती को राष्ट्रीय समस्या के रूप में स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थी और इसे केवल राज्य की समस्या मानकर देखती रही। इस संकीर्ण दृष्टिकोण के कारण समन्वित राष्ट्रीय रणनीति विकसित नहीं हो सकी, जिसका परिणाम यह हुआ कि नक्सलियों को विस्तार और सशक्त होने का अवसर मिला तथा समस्या और गहराती चली गई।
ऐसे दौर में छत्तीसगढ़ ने नक्सल प्रभावित राज्यों को एकजुट कर यूनिफाइड कमांड की बैठकों का नेतृत्व किया और नक्सलियों को चारों ओर से घेरकर समाप्त करने की नीति बनाई हालांकि केंद्र का पूर्ण समर्थन न होने की वजह से नक्सलवाद का संपूर्ण उन्मूलन धीमा रहा। अक्सर यह सवाल उठता है कि जब नक्सलवाद महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों से समाप्त हो सकता है तो छत्तीसगढ़ में इतना समय क्यों लगा? तब मैं इस बात का उल्लेख करता हूं कि यह छत्तीसगढ़ का दुर्भाग्य रहा कि जब प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार थी तब केंद्र की यूपीए सरकार से हमें वैसा समर्थन नहीं मिल पाया जैसा 2014 के बाद माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी की सरकार से मिला और यह श्री मोदी जी की दृढ़ इच्छाशक्ति और केंद्रीय गृहमंत्री “साध्य पुरुष” श्री अमित शाह जी की अजेय रणनीति का परिणाम है कि एक लक्ष्य बनाकर 31 मार्च 2026 तक 70 वर्षों से चली आ रही नक्सल समस्या का खात्मा किया है।
वर्ष 2019 में जब श्री अमित शाह जी ने केंद्रीय गृहमंत्री के रूप में शपथ ली, तब से देश ने निर्णायक बदलावों का दौर देखा है। 5 अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 को हटाकर कश्मीर को मुख्यधारा से जोड़ना हो या नागरिकता संशोधन अधिनियम ( CAA) लागू करना, उनके कार्यकाल में कई ऐतिहासिक निर्णय लिए गए। इसी कड़ी में, 24 अगस्त 2024 को गृहमंत्री ने देश से नक्सलवाद के समूल नाश का शंखनाद किया।
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी और गृहमंत्री श्री अमित शाह जी के कुशल नेतृत्व तथा जीरो टॉलरेंस की नीति ने नक्सलवाद की कमर तोड़ दी है। सुरक्षा बलों के निरंतर ऑपरेशनों और सख्त कार्रवाई के चलते बड़े नक्सली कमांडरों का खात्मा हुआ है। सरकार के इस बढ़ते दबावऔर सटीक रणनीति ने नक्सलियों को या तो पीछे हटने या आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर कर दिया है।
अंतिम चरण (2024–2026) में “ऑपरेशन कगार” के माध्यम से नक्सल नेतृत्व पर सीधा प्रहार किया गया। शीर्ष नक्सली नेताओं का खात्मा हुआ, हजारों ने आत्मसमर्पण किया और नक्सल संगठन की रीढ़ टूट गई। देश भर में साल 2024 से 2026 के बीच 706 नक्सली मारे गए, 2,218 गिरफ्तार किए गए और 4,800 से ज्यादा माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया, यह आँकड़े स्वयं गवाही देते हैं कि श्री अमित शाह जी की कुशल रणनीति और मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय जी एवं छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री श्री विजय शर्मा जी के निरंतर सहयोग से असंभव समझे जाने वाले अबूझमाड़ का किला ध्वस्त कर नक्सल विचारधारा का खात्मा संभव हुआ है।
जब मैं प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी की कार्य योजना की बात करता हूं तब मैंने वह दिन देखा है जब प्रधानमंत्री स्वयं दंतेवाडा के सुदूर क्षेत्र में पहुंचकर आदिवासियों का विश्वास जीतने के लिए कभी आदिवासी बच्चों के बीच समय बिताते हैं, कभी आदिवासी महिलाओं को चरण पादुका पहनाकर उनका सम्मान करते हैं और वहीं दूसरी तरफ देश के गृह मंत्री श्री अमित शाह जी ने नक्सलमुक्त भारत का संकल्प लेकर हर माह में 2 बार बस्तर का दौरा किया। श्री अमित शाह जी ने दफ्तर में बैठकर सिर्फ रणनीति ही नहीं बनाई बल्कि सुरक्षा बल के जवानों के साथ बस्तर के सुदूर कैंप में समय बिताया। जब देश का एक गृहमंत्री अपने जवानों के साथ इस प्रकार समय व्यतीत करता है, तब एक-एक जवान यह बोल उठता है कि हम नक्सलवाद के समूल नाश के लिए आपकी योजना के साथ खड़े हैं और उनकी इसी इच्छा शक्ति, प्रबल रणनीति और निरंतर संघर्ष का परिणाम है कि जिस लक्ष्य को पूरा देश असंभव समझता था उसे “साध्य पुरुष” बनकर श्री अमित शाह जी ने आज संभव कर दिखाया है।


