हमारे पांच मूल तत्व पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश माने जाते हैं. जिन्हें पंचभूत कहा जाता है. भारतीय दर्शन के अनुसार हमारा शरीर और मन भी इन्हीं तत्वों से बने हैं. जब इनका संतुलन बना रहता है तो जीवन सहज चलता है, लेकिन असंतुलन होने पर समस्याएं उत्पन्न होती हैं. शिव को शाश्वत योगी इसलिए कहा गया है क्योंकि वे इन पंचतत्वों के पूर्ण संतुलन और नियंत्रण का प्रतीक हैं.

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव ने दक्षिण भारत के पांच स्थानों पर इन पांच तत्वों के रूप में स्वयं को प्रकट किया. जिन्हें पंच भूत स्थल कहा जाता है. इन पांच मंदिरों में प्रत्येक एक तत्व का प्रतिनिधित्व करता है. वहां स्थापित लिंग उसी तत्व से जुड़ा माना जाता है. ‘पंच’ का अर्थ है पांच, ‘भूत’ का अर्थ तत्व और ‘स्थल’ का अर्थ स्थान. ये पांचों मंदिर साउथ इंडिया में स्थित हैं. चार तमिलनाडु में और एक आंध्र प्रदेश में. आश्चर्य की बात यह है कि ये सभी मंदिर लगभग एक सीधी रेखा में स्थित हैं, जबकि इनका निर्माण उस समय हुआ था जब आधुनिक तकनीक उपलब्ध नहीं थी.
- कांचीपुरम- (एकांबरेश्वर मंदिर)
पृथ्वी तत्व का प्रतिनिधित्व कांचीपुरम के एकांबरेश्वर मंदिर द्वारा किया जाता है. यह तत्व स्थिरता, धैर्य और मजबूती का प्रतीक है. यहां दर्शन करने से मन को ठहराव और जीवन में स्थायित्व की भावना प्राप्त होती है. - आंध्र प्रदेश- (श्रीकालहस्ती मंदिर)
वायु तत्व आंध्र प्रदेश के श्रीकालहस्ती मंदिर से जुड़ा है. यह तत्व जीवन की सांस, प्राण और विचारों का प्रतीक है. मान्यता है कि यहां शिव वायु रूप में विराजमान हैं. यह स्थान मानसिक तनाव और बेचैनी से राहत देने वाला माना जाता है. - तमिलनाडु- (अरुणाचलेश्वर मंदिर)
अग्नि तत्व का प्रतिनिधित्व तमिलनाडु के तिरुवन्नामलई स्थित अरुणाचलेश्वर मंदिर में होता है. अग्नि ऊर्जा, आत्मबल और परिवर्तन का प्रतीक है. यहां दर्शन करने से नकारात्मकता दूर होती है और आत्मविश्वास बढ़ता है. - तिरुचिरापल्ली- (जंबुकेश्वर)
जल तत्व तिरुचिरापल्ली के पास स्थित जंबुकेश्वर मंदिर से संबंधित है, जहां शिव निरंतर जल से अभिषिक्त रहते हैं. यह तत्व भावनाओं और जीवन के प्रवाह को दर्शाता है. यहां आने से मन को शांति और भावनात्मक संतुलन मिलता है. - चिदंबरम- (नटराज मंदिर)
आकाश तत्व चिदंबरम के नटराज मंदिर में दर्शाया गया है, जहां ठोस लिंग के स्थान पर खाली स्थान की पूजा होती है. यह चेतना और विस्तार का प्रतीक है. यहां शिव का नटराज रूप सृजन और विनाश के संतुलन को दर्शाता है.
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