“करम प्रधान विश्व करि राखा, जो जस करहि सो तस फल चाखा”
गोस्वामी तुलसीदास कृत ‘रामचरितमानस’ की यह चौपाई अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस के शाश्वत सत्य की ओर इशारा करने वाली पंक्ति है। यह दिवस आधुनिक सभ्यता की नींव रखने वाली संघर्ष, समर्पण और श्रम की कहानी का दुहराव है। विश्व इतिहास में कई अर्थों में महत्वपूर्ण है 1 मई का दिन। यह दिन 1886 के शिकागो के श्रमिक आंदोलन की याद दिलाता है जब 8 घंटे के कार्यदिवस की मांग को लेकर मजदूरों ने अपने अधिकारों के लिए संघर्ष किया था और भारत के संदर्भ में यही दिन 1960 में महाराष्ट्र और गुजरात जैसे दो महत्वपूर्ण राज्यों के गठन का भी प्रतीक है। बहुत सी घटनाओं ने मिल कर इस दिन को श्रम, संस्कृति और पहचान का संगम दिवस बना दिया है। किसी भी राष्ट्र की प्रगति केवल नीतियों और योजनाओं से नहीं बल्कि दिन-रात मेहनत करने वाले मज़दूरों के उन करोड़ों हाथों से होती है जो इन योजनाओं को धरती पर साकार रूप देते हैं। कारखानों में उत्पादन करने वाले मजदूर, खेतों में अन्न उपजाने वाले कृषक और निर्माण स्थलों पर काम करने वाले श्रमिक ही होते हैं राष्ट्र निर्माण के वास्तविक नायक।

चौथी औद्योगिक क्रांति और डिजिटल युग में प्रवेश करने वाली दुनिया में श्रम की प्रकृति बदल रही है। पहले शारीरिक श्रम को अधिक महत्व दिया जाता था मगर अब मानसिक और डिजिटल श्रम भी उतना ही महत्वपूर्ण हो गया है। ‘वर्क फ्रॉम होम’, ‘गिग इकॉनमी’ और ‘फ्रीलांसिंग’ जैसे नए Format उभरकर सामने आए हैं। 2026 के श्रमिक दिवस का विषय “Ensuring a Healthy Psychosocial Working Environment” मानसिक और डिजिटल श्रमिकों की चुनौतियों की ओर स्पष्ट संकेत करता है। श्रमिक उचित वेतन के साथ सम्मानजनक कार्य वातावरण, मानसिक स्वास्थ्य की सुरक्षा और सामाजिक न्याय की भी अपेक्षा रखते हैं। भारत में एक बड़ी आबादी असंगठित क्षेत्र में काम करती है ऐसी जगहों में श्रमिकों की स्थिति और भी जटिल है। निर्माण कार्य, कृषि, घरेलू कामकाज और छोटे उद्योगों में लगे श्रमिकों को अक्सर सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएँ और स्थायी रोजगार नहीं मिल पाता। ऐसे में समाज और सरकार दोनों की ही ज़िम्मेदारी बनती है कि वे इन श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा करते हुए उन्हें और भी सशक्त बनाएं।

1 मई को ही महाराष्ट्र और गुजरात दिवस के रूप में मनाया जाता है। 1960 में बॉम्बे राज्य के पुनर्गठन के बाद भाषाई अस्मिता और सांस्कृतिक गौरव के आधार पर इन दोनों राज्यों का गठन हुआ था। इन दो राज्यों के गठन ने साफ़ किया कि लोकतंत्र में लोगों की भावनाओं और पहचान का सम्मान कितना महत्वपूर्ण है।

महाराष्ट्र और गुजरात राज्य आज देश की अर्थव्यवस्था के सबसे मजबूत स्तंभ हैं। आज मुंबई, देश की आर्थिक राजधानी है और गुजरात उद्योग और व्यापार के क्षेत्र में अग्रणी है। इन दोनों राज्यों की सफलता के पीछे भी श्रमिकों की मेहनत, पसीने और समर्पण की कथा छिपी है। श्रमिक दिवस में यह आवश्यक हो जाता है कि हम औपचारिकताओं से परे कुछ ऐसा काम करें जो श्रमिकों के जीवन में वास्तविक परिवर्तन लाने वाला हो। उनके लिए कुछ कदम आवश्यक रूप से उठाए जाने चाहिए जैसे न्यूनतम वेतन सुनिश्चित करना, सुरक्षित कार्य वातावरण प्रदान करना, महिलाओं और कमजोर वर्गों के श्रमिकों को विशेष सुरक्षा देना। जलवायु परिवर्तन के इस दौर में ‘ग्रीन जॉब्स’ की अवधारणा भी तेजी से सामने आ रही है। उद्योगों को पर्यावरण के अनुकूल बनाते हुए श्रमिकों के लिए नए अवसर पैदा करने की मांग है। ‘जस्ट ट्रांजिशन’ का अर्थ है कि विकास की प्रक्रिया में श्रमिकों के हितों की अनदेखी न हो। आज श्रमिकों की माँग है कि श्रम आजीविका तो हो साथ ही सम्मान और पहचान का प्रतीक भी बने। मज़दूर दिवस उस चिंतन का अवसर भी है कि क्या हम उन मज़दूरों को वह सम्मान दे पा रहे हैं जिनके श्रम की शक्ति पर हमारी सुख-सुविधाएँ निर्भर करती हैं?

जब तक समाज के अंतिम पंक्ति में खड़े श्रमिक को उसका अधिकार और सम्मान नहीं मिल जाता तब तक विकास को अधूरा ही मानना होगा। श्रमिक दिवस उस संकल्प के लिए भी बहुत शुभ है कि हम एक ऐसे समाज का निर्माण करेंगे जहाँ हर श्रमिक को उसका हक, सम्मान और सुरक्षा मिले। राष्ट्र की असली ताकत उसकी मशीनों और इमारतों में नहीं बल्कि उन मेहनतकश हाथों में होती है जो उसे गढ़ने का काम करते हैं।

संदीप अखिल
सलाहकार संपादक
NEWS 24 मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़ /लल्लूराम डॉट कॉम
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