दिल्ली हाई कोर्ट(Delhi High Court) ने पॉक्सो मामलों में नाबालिग पीड़ितों को बार-बार अदालत में पेशी के लिए बुलाए जाने पर गंभीर चिंता जताई है।अदालत ने निचली अदालतों के इस रवैये को अनुचित ठहराते हुए स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि बच्चों को ट्रायल या जमानत सुनवाई के दौरान बार-बार कोर्ट बुलाना सही नहीं है। जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की अदालत ने कहा कि इस तरह की प्रक्रिया से नाबालिग पीड़ितों को मानसिक पीड़ा होती है और उन्हें दोबारा ट्रॉमा का सामना करना पड़ सकता है। अदालत ने यह भी कहा कि न्यायिक प्रक्रिया को संवेदनशील और पीड़ित-हितैषी होना चाहिए।
यह टिप्पणी 2022 के एक यौन उत्पीड़न मामले की सुनवाई के दौरान आई, जिसमें ट्रायल के दौरान नाबालिग पीड़िता को 9 बार कोर्ट में पेश होना पड़ा। इतना ही नहीं, एक बार पेशी पर अनुपस्थित रहने पर उसके खिलाफ जमानती वारंट तक जारी कर दिया गया था।
बार एंड बेंच में प्रकाशित खबर के मुताबिक, जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंस एक्ट के तहत बच्चों के हितों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि बार-बार पेशी से नाबालिगों को मानसिक आघात और दोबारा ट्रॉमा का सामना करना पड़ता है। अदालत ने यह भी सुझाव दिया कि बच्चों के बयान दर्ज करने के लिए जहां संभव हो, वहां वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग का इस्तेमाल किया जाए। इससे नाबालिग पीड़ितों को अदालत में बार-बार आने की जरूरत नहीं पड़ेगी और उनकी मानसिक स्थिति पर भी कम असर पड़ेगा।
दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया है कि जमानत याचिकाओं की सुनवाई के दौरान पीड़ित को अपनी बात रखने का पूरा अधिकार है, लेकिन इस अधिकार का मतलब यह नहीं है कि उसे हर सुनवाई में अनिवार्य रूप से उपस्थित होना पड़े। जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की अदालत ने कहा कि यदि एक बार पीड़ित के आपत्ति या विचार दर्ज हो चुके हैं, तो बाद की हर सुनवाई में उसकी शारीरिक या वर्चुअल उपस्थिति पर जोर देना उचित नहीं है।
2022 का यौन उत्पीड़न मामला
दिल्ली हाई कोर्ट ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी 2022 में दर्ज एक यौन उत्पीड़न मामले में तीन नाबालिग पीड़िताओं की याचिका पर सुनवाई के दौरान की। याचिका के मुताबिक, तीनों लड़कियां लापता हो गई थीं और बाद में दिल्ली में बरामद हुईं। पीड़िताओं ने आरोप लगाया कि उन्हें दो दिनों तक बंधक बनाकर रखा गया, जहां कई आरोपियों ने उनके साथ यौन उत्पीड़न किया और उन्हें धमकाया भी।इस गंभीर मामले में आरोपियों के खिलाफ बलात्कार, मानव तस्करी और प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंस एक्ट (पॉक्सो) के तहत भी धाराएं जोड़ी गई हैं।
बार-बार गवाही के लिए बुलाने से मानसिक तनाव
याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि ट्रायल के दौरान उन्हें कई बार गवाही के लिए बुलाया गया, जिससे उन्हें गंभीर मानसिक परेशानी का सामना करना पड़ा। याचिका के अनुसार, एक नाबालिग पीड़िता को उसकी गवाही पूरी होने से पहले ही नौ बार अदालत में पेश होना पड़ा, जबकि अन्य दो पीड़िताओं को भी कई बार बुलाया गया। इस बार-बार की पेशी से उन्हें मानसिक तनाव और आघात झेलना पड़ा। इतना ही नहीं, एक नाबालिग पीड़िता के अदालत में उपस्थित न होने पर ट्रायल कोर्ट ने उसके खिलाफ जमानती वारंट भी जारी कर दिया था। इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की अदालत ने उस वारंट को रद्द कर दिया।
ट्रायल कोर्ट को निर्देश
दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि नाबालिग पीड़ितों के हितों की सुरक्षा के लिए पहले ही कई महत्वपूर्ण दिशानिर्देश जारी किए जा चुके हैं, जिनका पालन करना सभी ट्रायल कोर्ट और विशेष अदालतों की जिम्मेदारी है। जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की अदालत ने स्पष्ट किया कि इन दिशानिर्देशों को एक समान और सख्ती से लागू किया जाना चाहिए, ताकि न्यायिक प्रक्रिया के दौरान बच्चों को किसी भी तरह की अनावश्यक मानसिक पीड़ा का सामना न करना पड़े।
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