
चर्चा में विधायक पुत्र
सियासत में कभी-कभी ऐसे पात्र प्रकट हो जाते हैं, जिनकी कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं लगती। सूबे की सियासत में एक विधायक से जुड़ी कहानी भी फिल्मी पटकथा सरीखे हैं। थोड़ा एक्शन है और थोड़ा ड्रामा। उन पर पूरी फिल्म बन सकती है। इस विधायक की सियासी यात्रा एक घटना के केंद्र में रहते हुए तब शुरू हुई थी, जब वह सियासत की एबीसीडी से भी परिचित नहीं थे। एक अप्रत्याशित घटना ने उन्हें ऐसा नेता बना दिया कि वह खुद चकित रह गए। परिस्थितियों ने उन्हें जिताया भी और उनके चेहरे ने आसपास की कई और सीटों पर भगवा पताका लहरा दिया। तब वह एक सियासी औजार बन गए थे। औजार खूब चल निकला था। फिलहाल उनकी कहानी के इस हिस्से में उनसे ज्यादा उनके सुपुत्र की चर्चा है। दरअसल हुआ कुछ यूं कि विधायक के सुपुत्र ने गंगाजल फिल्म देख ली थी, जिसमें बाहुबली नेता साधु यादव का बेटा सुंदर यादव मंडप से दुल्हन का अपहरण कर लेता है। विधायक के सुपुत्र ने भी कुछ ऐसी तस्वीर बनाने की कोशिश की है। चर्चा है कि विधायक के सुपुत्र की प्रेमिका की शादी कहीं दूसरी जगह तय हो गई है। मंडप सज गया है। बारात आने वाली है, लेकिन उससे पहले ही सुपुत्र ने धमकी दे डाली है कि वह अपनी प्रेमिका को मंडप से उठा कर ही दम लेगा। शायद यह उसका एकतरफा प्रेम है। एकतरफा प्रेम खूब बेचैन करता है। सीने में तेज जलन होती है। पेट में खूब हलचल होती है। दिल और दिमाग एक अजीब किस्म की अशांति से भर जाता है। आंखों से नींद गायब हो जाती है। खाने-पीने का होश नहीं रह जाता है। कुछ कहने, बोलने और समझने का भान भी नहीं होता। विधायक का सुपुत्र इसी जुनून में दिख रहा है। वैसे भी है तो विधायक का बेटा। सत्ता के नशे में मदमस्त। होश खो बैठा होगा और जोश में उसने धमकी दे डाली होगी। बहरहाल कुछ समझदार लोगों ने इस घटना के लाभ-हानि की गणना कर विधायक को समझाया बुझाया है। सुना है कि अब विधायक महोदय अपने बेटे की खुली धमकी पर लोगों से माफी मांगते घूम रहे हैं।
अमीबा-पैरामीशियम
एक भ्रष्ट अफसर अमीबा और पैरामीशियम की तरह होता है। अमीबा की तरह वह बिना किसी आकार-प्रकार के हर जगह फैल जाता है। जहां भी रिश्वत का कण दिखता है, वह तुरंत अपना छद्मपाद (pseudopodia) बढ़ा कर उसे निगल लेता है। सब कुछ पचाकर बिना कोई गंध छोड़े वह अगले शिकार की तलाश में निकल जाता है। पैरामीशियम के पास सिलिया (cilia) होते हैं। ये सिलिया वर्दीधारी सहयोगी, दलाल और मध्यस्थ के रूप में होते हैं, जो लगातार घूम-घूम कर भ्रष्ट अफसर के हितों की रक्षा करने में पूरा जोर लगा देते हैं। सरकार ने चंद महीने पहले सूबे की सियासत के सबसे बड़े केंद्र की पुलिसिया व्यवस्था में बड़ा बदलाव कर दिया था। जाहिर है इससे सड़कों पर मुस्तैदी दिखी। कागजों में दर्ज होने वाले अपराध के आंकड़ों में सुधार आया। मगर सुधार की प्रक्रिया के बीच एक अफसर की करतूत उजागर हो गई। चर्चा है कि अफसर ने समानांतर क्राइम ब्रांच खड़ा कर लिया था। उन्होंने अपने एक पुराने भरोसेमंद थाना प्रभारी को अघोषित रूप से खुद के हितों को साधने का जिम्मा सौंप दिया। हर रोज का हिसाब बेहिसाब चल ही रहा था कि ऊपर बैठे अफसरों की निगरानी ने हरकतों को पकड़ लिया। थाना प्रभारी नप गया। अफसर के कंधों पर सितारे की चमक तेज थी, सो उनके हिस्से केवल कड़ी फटकार आई। अब जिन लोगों को अमीबा और पैरामीशियम के गुण-दोष नहीं पता, वह इसके बारे में थोड़ा पढ़ लें। अफसर के कामकाज के तौर तरीके समझने में सुविधा होगी।
पॉवर सेंटर: सहयोग… बेहाल कांग्रेस… निजी हथियार… आहट… पोस्टिंग… – आशीष तिवारी
कोयले का धुआं
पिछले साल जीएसटी कलेक्शन ने सरकार की खूब पीठ थपथपाई थी। छत्तीसगढ़ पूरे देश में अव्वल था। खूब तालियां बजी। सरकार के हिस्से शाबाशी आई। मगर इस बार सरकार घबरा गई है। जीएसटी कलेक्शन में 10 फीसदी तक की गिरावट का अनुमान है। एक आंकड़ा देखिए- राज्य में इस साल जीएसटी कलेक्शन का लक्ष्य करीब 27 हजार करोड़ रुपए रखा गया था। फिर इसे घटा कर करीब 24 हजार करोड़ रुपए किया गया और अब स्थिति यह है कि अनुमान करीब 21 हजार करोड़ रुपए पर आ गया है। वह भी पूरा होगा या नहीं यह अभी धुआं-धुआं है। जीएसटी कलेक्शन की बुनियाद पर ही पूरा बजट खड़ा किया जाता है। जन हितैषी योजनाएं इसी पर टिकी होती हैं। ऐसे में जब आय का मुख्य स्रोत ही लड़खड़ा जाएगा, तो योजनाएं भरभराकर गिरेंगी यह तय है। खैर, सरकार के सामने समस्या यह नहीं है कि खर्च अचानक से बढ़ जाएगा। समस्या यह है कि जिन स्त्रोतों से आय आनी थी, वह अब स्थिर नहीं रह गई है। इस पूरी त्रासदी के केंद्र में कोयला है। कोयला, जिसे राज्य की ताकत कहते थे। वही कोयला आज सरकार की कमाई पर कैंची चला रहा है। कोयले से होने वाली कमाई औंधे मुंह गिर रही है। इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर ने इस चुनौती को और गहरा कर दिया है। कोयले के इनपुट यानी कच्चा माल, परिवहन जैसी सेवाओं पर 18 फीसदी और आउटपुट यानी कोयले की बिक्री पर पहले केवल 5 फीसदी टैक्स होने की वजह से कंपनियों के पास इनपुट टैक्स क्रेडिट जमा होता गया। अब भले ही कोयले पर जीएसटी 5 फीसदी से बढ़ाकर 18 फीसदी कर दिया गया हो, लेकिन इससे टैक्स लायबिलिटी भी तीन गुना तक बढ़ गई है। केवल SECL के पास अकेले 3 हजार करोड़ रुपये का इनपुट टैक्स क्रेडिट है और राजस्थान विद्युत निगम के पास 2 हजार करोड़ रुपए का। यह सारा पैसा कागजों पर सरकार का है, मगर खजाने तक नहीं पहुंच रहा है। कंपनियां इसे टैक्स में समायोजित कर रही हैं। जिस कोयले की खदानों पर राज्य गर्व करता था, उसी कोयले ने जीएसटी के गणित में ऐसा उल्टा खेल खेल दिया कि राज्य की सबसे बड़ी ताकत उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन गई। टैक्स बढ़ाया, मगर नकदी घट गई। कोयले की काली धूल में कमाई का दम घुट रहा है। सरकार के हाथ सुन बटे सन्नाटा आ रहा है।
‘क’ से कर्ज
जीएसटी कलेक्शन में कमी की एक बड़ी वजह तो खुद जीएसटी के नियम हैं। नियम साफ कहता है- ज्यादा टैक्स वहां जाएगा, जहां वस्तु का उपभोग होगा। इसका मतलब साफ है कि कोयला छत्तीसगढ़ से निकलेगा, लेकिन उसका सबसे बड़ा टैक्स लाभ उन राज्यों को मिलेगा, जहां इसकी खपत ज्यादा है। छत्तीसगढ़ के लिए यह दुर्भाग्य जनक स्थिति है। राज्य की प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से कम है, यानी उपभोग भी अपेक्षाकृत कम ही है। नतीजा यह कि उत्पादक राज्य होने के बावजूद छत्तीसगढ़ को जीएसटी से मिलने वाला लाभ सीमित रह जाता है। डबल इंजन की सरकार के लिए यह समय की मांग है कि जीएसटी काउंसिल में छत्तीसगढ़ जैसे उत्पादक राज्य के हितों की चिंता की जाए। यह बड़ी अजीब बात है कि संसाधन छत्तीसगढ़ का और फायदा किसी दूसरे राज्य को पहुंचे। अगर समय रहते समाधान नहीं निकाला गया, तो चुनाव के वादे कागजों तक ही सिमट जाएंगे और सरकार को जनता की भलाई के लिए ‘क’ से कर्ज पढ़ना पड़ जाएगा। राज्य की आर्थिक स्थिति खस्ताहाल होते देर नहीं लगेगी। सबसे ज्यादा असर इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट पर पड़ेगा। फ्रीबीज तो सरकार की मजबूरी है। कर्ज ले ले कर सरकार ये देगी ही।
पॉवर सेंटर : अफीम…हाय तौबा…रुपया…प्रशासनिक असंतुलन…45 करोड़ का आफर !…ईनाम…- आशीष तिवारी
नारी शक्ति
विवादों में रही पीएससी की छवि को सुधारने का जिम्मा सरकार ने नारी शक्ति के हवाले कर रखा है। पहले सरकार ने रिटायर्ड आईएएस रीता शांडिल्य को अध्यक्ष बनाया। इसके बाद 2019 बैच की आईएएस रेना जमील को बतौर सचिव तैनाती दी। रेना जमील जांजगीर जिले के पहरीद गांव में बोरवेल में गिरे राहुल साहू का रेस्क्यू करने वाली टीम में शामिल थीं। जब तक राहुल बाहर नहीं निकल आया, तब तक वह भी मुस्तैदी से डटी रहीं थी। पीएससी की परीक्षा नियंत्रक भी महिला अफसर लीना कोसम हैं। लीना को हाल ही में आईएएस अवार्ड हुआ है। पीएससी पर राज्य बनने के बाद से ही बदनामी के छींटे पड़ते रहे हैं। राज्य बनने के बाद पहली बार 2003 में पीएससी की परीक्षा आयोजित हुई। जो आज तक कानूनी उलझनों में है। हालांकि इस बैच के अफसर अब कलेक्टर बन गए हैं और मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। पहली परीक्षा इतनी विवादों में घिरी कि पीएससी के अध्यक्ष रहे पूर्व डीजीपी अशोक दरबारी के खिलाफ भी गिरफ्तारी वारंट जारी हो गया। कभी स्केलिंग तो कभी किसी वजह से पीएससी विवादों में रही। 2003 और 2005 पीएससी में ऑप्शनल सब्जेक्ट के साथ लिखित परीक्षा हुई। 2008 और 2011 में पीएससी की परीक्षा ऑब्जेक्टिव कर दी गई। 2012 से पैटर्न बदलते हुए पीएससी को सब्जेक्टिव कर दिया गया। ऑप्शनल सब्जेक्ट की बाध्यता खत्म कर दी गई। मुख्य परीक्षा में 7 पेपर देने का पैटर्न लाया गया। यही पैटर्न 2012 से लेकर अब तक चल रहा है। बावजूद इसके पीएससी परीक्षा विवादित ही रही। पीएससी में धांधली को लेकर पीएससी के अध्यक्ष टामन सिंह सोनवानी, सचिव जीवन किशोर ध्रुव और परीक्षा नियंत्रक रही आरती वासनिक को जेल की हवा तक खानी पड़ी। पीएससी राजनीतिक मुद्दा रहा है, ज़ाहिर है सूबे की सरकार विवादों को खत्म कर साख की बहाली पर ज़ोर दे रही है। शायद इसलिए ही नारी शक्ति पर भरोसा जताया है।
पॉवर सेंटर : सिर्फ 12%…चाबी…धरोहर…तरक्की की सीढ़ी…फायदा या नुकसान?…निजी हित …बड़ा खेल…- आशीष तिवारी
एक्सटेंशन!
छत्तीसगढ़ के वन महकमे में इन दिनों एक दिलचस्प खामोशी है। बाहर से सब सामान्य दिख रहा है, लेकिन भीतर हलचल तेज है। वजह है पीसीसीएफ और हेड ऑफ फॉरेस्ट श्रीनिवास राव का नजदीक आता रिटायरमेंट और उससे भी ज्यादा उनके संभावित एक्सटेंशन की चर्चा। श्रीनिवास राव का करियर कई असामान्य मोड़ों से गुजरा है। कहा जा रहा है कि उनके पीछे मजबूत राजनीतिक समर्थन है। उनकी जड़ें राज्य की सीमाओं से बाहर तक फैली हैं। अगर उनका एक्सटेंशन होता है तो सबसे बड़ा असर उस कतार पर पड़ेगा जो वर्षों से अपनी बारी का इंतजार कर रहा है। पीसीसीएफ और हेड ऑफ फॉरेस्ट की दौड़ में सबसे आगे आईएफएस अरुण पाण्डेय और ओ पी यादव का नाम है, लेकिन एक्सटेंशन का मतलब होगा उनकी संभावना का टल जाना। अगर एक्सटेंशन नहीं होता तो तस्वीर और रोचक हो जाती है। मुकाबला सिर्फ सीनियरिटी का नहीं रहेगा, बल्कि क्षेत्रीय संतुलन और आंतरिक समीकरण भी अहम हो जाएगा। अरुण पाण्डेय और ओपी यादव दोनों अफसर अंबिकापुर से आते हैं। ऐसे में अगर श्रीनिवास राव का एक्सटेंशन नहीं हुआ, तो अगला हेड ऑफ फॉरेस्ट अंबिकापुर से ही होगा। इसकी पूरी संभावना है। वैसे यह भी बता दें कि चर्चाओं में जो दो नाम आगे हैं, उनमें से एक पर मंत्री की नजरें थोड़ी टेढ़ी है। न जाने क्या बात है कि मंत्री उनसे नाराज चल रहे हैं।
पॉवर सेंटर: टूटती गरिमा… कलेक्टरों की भूमिका… मेंटरशिप… दृष्टांत… हल्ला… शैडो… – आशीष तिवारी
चिट्ठी
जनवरी की ठिठुरती सुबह में एक चिट्ठी निकली। कागज़ पर स्याही थी, लेकिन लहजा हल्का सा तपता हुआ था। यह चिट्ठी थी केंद्रीय राज्य मंत्री तोखन साहू की और भेजी गई थी लोक सभा अध्यक्ष ओम बिरला को। मंत्री की पीड़ा बड़ी स्पष्ट थी कि प्रोटोकॉल में उन्हें हाशिए पर डाला जा रहा है। उनके संसदीय क्षेत्र में होने वाले सरकारी कार्यक्रमों में उन्हें न निमंत्रण दिया जाता है और न ही सूचना। अगर भूले भटके निमंत्रण दे भी दिया जाता है तो मंच पर एक कोने में जगह दी जाती है। भाषण तो दूर की बात। चिट्ठी में यह दर्ज किया गया कि यह व्यक्तिगत अपमान नहीं बल्कि संसदीय गरिमा का प्रश्न है। खैर, चिट्ठी ने अपना काम बखूबी किया। ओम बिरला ने उसे आगे बढ़ाया। मंत्रालय ने संज्ञान लिया और मुख्य सचिव तक बात पहुंची। हाशिए पर गया केंद्रीय मंत्री का प्रोटोकॉल लौट आया। कुर्सी के साथ सम्मान मिला। दरअसल यह पूरा मामला सिर्फ़ प्रोटोकॉल का नहीं है। यह इलाके में वर्चस्व की लड़ाई की एक कड़ी है। यह ख़त्म नहीं हुई है। इस चिट्ठी ने एक नई लकीर खींच दी है। देखते जाइए आगे बहुत कुछ दिखने वाला है।
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