शास्त्रों के अनुसार हर दिन 90 मिनट का टाइम ऐसा होता है, जिसमें राहुकाल लगता है. इसमें कोई भी शुभ कार्य करने की मनाही होती है. लेकिन इस मंदिर में राहुकाल के दौरान विशेष पूजा-अर्चना की जाती है. जहां अन्य स्थानों पर राहुकाल के समय शुभ कार्यों से परहेज किया जाता है, वहीं यहां श्रद्धालु बड़ी संख्या में देवी के दर्शन करने पहुंचते हैं.

कर्नाटक के बागलकोट जिले में स्थित बनशंकरी मंदिर अपनी अनोखी परंपराओं के कारण देशभर में प्रसिद्ध है. यहां वह समय भी पूजा के लिए विशेष माना जाता है, जिसे आमतौर पर लोग अशुभ मानकर टालते हैं. मान्यता है कि राहुकाल में की गई पूजा से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं. मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. इसी आस्था के चलते दूर-दूर से भक्त यहां आकर पूजा-अर्चना करते हैं.
मंदिर से जुड़ा हुआ इतिहास
यह मंदिर चालुक्य काल से जुड़ा हुआ है. इतिहास के अनुसार, राजा जगदेकमल्ल प्रथम ने 603 ईस्वी में इसका निर्माण कराया था, जबकि बाद में 1750 में इसका पुनर्निर्माण भी कराया गया. बनशंकरी देवी को क्षेत्र में कुलदेवी के रूप में पूजा जाता है. भक्त उन्हें बलव्वा, बनदव्वा, शिरावंती, चौदम्मा, चूडेश्वरी और शाकंभरी जैसे विभिन्न नामों से भी जानते हैं.
देवी शाकंभरी से जुड़ी है कथा
देवी का स्वरूप अष्टभुजाधारी है, जो सिंह पर विराजमान हैं. उनके हाथों में त्रिशूल, तलवार और अन्य आयुध हैं, जबकि चरणों के नीचे राक्षस का धड़ दबा हुआ दर्शाया गया है. देवी शाकंभरी से जुड़ी एक कथा भी प्रचलित है, जिसमें सूखे से पीड़ित लोगों की पुकार पर देवी ने अपने अश्रुओं से धरती को तृप्त किया और शाक-भाजियों का सृजन कर लोगों का पालन किया.
बनशंकरी जत्रा अकेला होता है आकर्षण का केंद्र
मंदिर में ‘पल्लेदा हब्बा’ उत्सव विशेष आकर्षण का केंद्र होता है, जिसमें देवी को विभिन्न सब्जियों से सजाया जाता है और अनेक प्रकार के व्यंजन अर्पित किए जाते हैं. इसके अलावा बनशंकरी जत्रा नामक वार्षिक मेला भी आयोजित होता है, जो तीन सप्ताह तक चलता है. इस दौरान रथयात्रा और विशेष अनुष्ठानों में बड़ी संख्या में श्रद्धालु भाग लेते हैं.
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