केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं को प्रवेश देने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में लगातार सुनवाई चल रही है। मंदिर का मैनेजमेंट देखने वाले त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड के वकील एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा, किसी धर्म की प्रथा सही है या नहीं, यह उसी समुदाय की आस्था के आधार पर तय होगा। जज खुद यह तय नहीं करेंगे कि धर्म के लिए क्या सही है, क्या गलत।’ उन्होंने कहा कि धर्म एक समूह या समुदाय की आस्था से जुड़ा है। इसलिए कुछ लोगों (महिलाओं की एंट्री) के अधिकार को पूरे समुदाय के अधिकारों पर हावी नहीं होने दिया जा सकता।

सरकार ने कहा – धार्मिक परंपराओं का सम्मान किया जाना चाहिए

इससे पहले 7 से 9 अप्रैल तक 3 दिन सुनवाई के दौरान भी महिलाओं की एंट्री के विरोध में दलीलें रखी गईं। केंद्र सरकार ने कहा था कि देश के कई देवी मंदिरों में पुरुषों की एंट्री भी बैन है, इसलिए धार्मिक परंपराओं का सम्मान किया जाना चाहिए। केरल हाईकोर्ट ने 1991 में सबरीमाला में 10 से 50 साल की महिलाओं की एंट्री पर बैन लगाई थी। सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इसे भेदभावपूर्ण बताते हुए बैन हटा दिया। इसके बाद दायर पुनर्विचार याचिकाओं के आधार पर 7 महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न तय किए गए हैं, जिन पर अब बहस हो रही है।

कोर्ट ने कहा था – हमारे पास अंधविश्वास तय करने का अधिकार

वहीं इससे पहले मामले में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि किसी धर्म में कौन सी प्रथा अंधविश्वास है, यह तय करने का अधिकार उसके क्षेत्राधिकार में आता है। अदालत की यह टिप्पणी सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल Tushar Mehta की दलील पर आई। उन्होंने कहा था कि धर्मनिरपेक्ष अदालत को धार्मिक प्रथाओं पर फैसला नहीं करना चाहिए, क्योंकि न्यायाधीश कानून के विशेषज्ञ होते हैं, धर्म के नहीं। उन्होंने सवाल उठाया कि अदालत कैसे तय कर सकती है कि कौन सी प्रथा अंधविश्वास है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि कोई प्रथा अंधविश्वास मानी भी जाए, तो उसमें हस्तक्षेप करना अदालत का नहीं, बल्कि विधायिका का काम है, जैसा कि संविधान के अनुच्छेद 25(2)(ब) में प्रावधान है।

सुप्रीम कोर्ट में 50 से ज्यादा रिव्यू पिटीशन

धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव का मामला बीते 26 सालों से देश की अदालतों में हैं। 2018 में, 5 जजों की बेंच ने 4:1 के बहुमत से मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक हटा दी थी। इसके बाद कई पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं।

सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों की संविधान बेंच 7 अप्रैल से 22 अप्रैल तक 50 से ज्यादा याचिकाओं पर सुनवाई करेगी। कोर्ट में रिव्यू पिटीशनरों और उन्हें सपोर्ट करने वाले 7 अप्रैल से 9 अप्रैल तक, जबकि विरोध करने वाले 14 अप्रैल से 16 अप्रैल तक दलीलें दे सकेंगे।

Follow the LALLURAM.COM MP channel on WhatsApp
https://whatsapp.com/channel/0029Va6fzuULSmbeNxuA9j0m