Dharm Desk – हिन्दू धर्म में सोलह संस्कारों का विशेष महत्व बताया गया है. जिनमें उपनयन संस्कार प्रमुख माना जाता है. उपनयन संस्कार को जनेऊ भी कहते है. इसी संस्कार को यज्ञोपवीत संस्कार भी कहा जाता है. मान्यता है कि जब बालक ज्ञान प्राप्त करने योग्य हो जाता है, तब यह संस्कार किया जाता है. जिससे उसके भीतर आध्यात्मिक चेतना जागृत होती है. वह धर्म, कर्तव्य और अनुशासन के मार्ग पर अग्रसर होता है. यज्ञोपवीत संस्कार केवल एक वर्ग तक सीमित नहीं, बल्कि हर समाज के लिए कर्तव्य, अनुशासन और आध्यात्मिक जागरूकता का संदेश देता है. यह माता-पिता, गुरु और समाज के प्रति उत्तरदायित्व का बोध कराता है. मनुष्य को धर्म, ज्ञान और कर्तव्य के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता है.

इस तरह तैयार होती है जनेऊ
जनेऊ, जो तीन धागों से मिलकर बना होता है, इस संस्कार का मुख्य प्रतीक है. यह केवल एक धागा नहीं, बल्कि जीवन के मूल सिद्धांतों का बोध कराता है. ये तीन धागे बल, वीर्य और ओज के प्रतीक माने गए हैं और साथ ही ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद की रक्षा का संकेत भी देते हैं. यह सत, रज और तम गुणों की ओर भी ध्यान आकर्षित करता हैं.
वर्ग के अनुसार उपनयन संस्कार
परंपरा के अनुसार ब्राह्मण बालक का उपनयन आठवें वर्ष में, क्षत्रिय का ग्यारहवें और वैश्य का पंद्रहवें वर्ष में किया जाता है. संस्कार के दौरान मंडप सजाया जाता है, मुंडन, स्नान और अन्य विधियों के साथ बालक को जनेऊ धारण कराया जाता है. भिक्षा मांगने की परंपरा भी इसका महत्वपूर्ण हिस्सा है. जो विनम्रता और आत्मनिर्भरता का प्रतीक है.
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