दिल्ली विधानसभा के एक दिन के विशेष सत्र में मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता (Rekha Gupta) ने विपक्ष पर तीखा हमला बोला। महिला आरक्षण के मुद्दे को लेकर उन्होंने कहा कि विपक्ष की “महिला विरोधी सोच” के कारण ही देश में महिलाओं को लंबे समय तक उनका अधिकार नहीं मिल सका। अपने संबोधन के दौरान सीएम ने आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल (Arvind Kejriwal) पर भी सीधे सवाल उठाए। उन्होंने केजरीवाल के जस्टिस स्वर्ण कांता (Swarn Kanta Sharma) के सामने पेश न होने के फैसले को लेकर आलोचना करते हुए इसे महिलाओं के प्रति असम्मान से जोड़ा। रेखा गुप्ता ने कहा कि उन्हें इस पूरे मामले में केजरीवाल का “महिला विरोधी चेहरा” नजर आता है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि चूंकि न्यायाधीश एक महिला हैं और निष्पक्ष तरीके से फैसला देंगी, इसलिए केजरीवाल इस प्रक्रिया से बचने की कोशिश कर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि “सत्याग्रह” जैसे पवित्र शब्द का दुरुपयोग किया जा रहा है, जबकि इसी विचारधारा से देश को आज़ादी मिली थी। उन्होंने टिप्पणी करते हुए महात्मा गांधी का जिक्र किया और कहा कि आज इस तरह के प्रयोग से उन्हें भी पीड़ा होती। मुख्यमंत्री ने बिना नाम लिए अरविंद केजरीवाल पर निशाना साधते हुए कहा कि इस तरह के बयान और व्यवहार लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि “मेरी मर्जी” की मानसिकता के तहत कुछ लोग खुद को कानून से ऊपर समझते हैं और न्यायिक प्रक्रिया से बचने की कोशिश करते हैं।

मुख्यमंत्री ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति खुद ही मुजरिम, गवाह, वकील और न्यायाधीश बनने लगे, तो यह लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक संकेत है। उन्होंने स्पष्ट किया कि न्याय करने का अधिकार केवल न्यायपालिका के पास है और उसी प्रक्रिया के माध्यम से सच्चाई सामने आती है। सीएम ने कहा कि कुछ राजनीतिक दल जनता को गुमराह करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन किए गए कार्यों का परिणाम अंततः सामने आकर रहेगा। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि कानून और न्यायिक व्यवस्था से ऊपर कोई नहीं है। इस दौरान उन्होंने आतिशी के प्रति संवेदना जताते हुए कहा कि जिन परिस्थितियों में वे काम कर रही हैं, वे काफी कठिन हैं।

मुख्यमंत्री ने महिला आरक्षण के मुद्दे पर केंद्र सरकार की पहल को रेखांकित करते हुए विपक्ष की भूमिका पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि केंद्र ने ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023’ के जरिए लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। सीएम ने बताया कि इसके लिए 131वां संविधान संशोधन विधेयक भी प्रस्तुत किया गया, ताकि महिलाओं को जल्द से जल्द राजनीतिक प्रतिनिधित्व का लाभ मिल सके। उन्होंने कहा कि यह कदम देश में महिला सशक्तिकरण को नई दिशा देने वाला है।

हालांकि, उन्होंने 16, 17 और 18 अप्रैल को भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में “दुखद अध्याय” बताते हुए कहा कि इन दिनों देशभर की महिलाएं लोकसभा की कार्यवाही को उम्मीद के साथ देख रही थीं। उन्हें विश्वास था कि 78 वर्षों का लंबा इंतजार खत्म होगा और उन्हें संसद व विधानसभाओं में उचित प्रतिनिधित्व मिलेगा। मुख्यमंत्री के अनुसार, इन दिनों हुई चर्चाओं ने महिलाओं की उम्मीदों को निराश किया। उन्होंने आरोप लगाया कि राजनीतिक मतभेदों और विपक्ष के रुख के कारण महिला आरक्षण के मुद्दे पर अपेक्षित प्रगति नहीं हो सकी।

महिला आरक्षण क्यों है जरूरी

मुख्यमंत्री ने कहा कि महिला आरक्षण इसलिए जरूरी है क्योंकि महिलाओं को समाज में पुरुषों की तुलना में अधिक बाधाओं और चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में केवल समान अधिकार पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि विशेष प्रावधान ही उन्हें वास्तविक समान अवसर दिला सकते हैं। सीएम ने कहा कि आरक्षण और जनसमर्थन के माध्यम से ही उन्हें स्वयं जनसेवा का अवसर मिला है, जो इस व्यवस्था की उपयोगिता को दर्शाता है। उन्होंने यह भी बताया कि पंचायत और स्थानीय निकायों में बड़ी संख्या में महिलाएं निर्वाचित होकर आ रही हैं, लेकिन जब बात विधानसभा और संसद की होती है, तो उनकी भागीदारी काफी कम रह जाती है। मुख्यमंत्री के अनुसार, देश में करीब 4600 विधायकों में केवल लगभग 10 प्रतिशत महिलाएं हैं, जबकि लोकसभा और राज्यसभा में उनकी हिस्सेदारी करीब 13-14 प्रतिशत ही है। उन्होंने इसे अवसरों की कमी का स्पष्ट संकेत बताते हुए कहा कि महिला आरक्षण के जरिए ही इस असंतुलन को दूर किया जा सकता है।

 ‘अधिकार मिले, अवसर नहीं मिले’

मुख्यमंत्री ने कहा कि संविधान ने महिलाओं को समान अधिकार और चुनाव लड़ने का अवसर जरूर दिया, लेकिन केवल इससे वे राजनीति में आगे नहीं बढ़ सकीं। उनके अनुसार, व्यावहारिक स्तर पर महिलाओं को लंबे समय तक पर्याप्त राजनीतिक अवसर नहीं मिल पाए। सीएम ने बताया कि महिला आरक्षण विधेयक पिछले 27 वर्षों में सात बार संसद में पेश हुआ, लेकिन हर बार किसी न किसी वजह से इसे रोका गया। उन्होंने आरोप लगाया कि कई राजनीतिक दलों ने इसमें बाधाएं खड़ी कीं और महिलाओं की भूमिका को सीमित बनाए रखा।

मुख्यमंत्री ने कहा कि जहां अन्य दलों ने अड़चनें पैदा कीं, वहीं भाजपा ने महिलाओं को आगे बढ़ने के अवसर देने का काम किया। उन्होंने यह भी जोर दिया कि महिला प्रतिनिधित्व बढ़ाना केवल अधिकार देने से संभव नहीं है, बल्कि इसके लिए ठोस नीतिगत कदम और आरक्षण जैसे विशेष प्रावधान जरूरी हैं। सीएम ने अपने संबोधन में कहा कि वर्ष 2014 के बाद प्रधानमंत्री जी के नेतृत्व में महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में व्यापक बदलाव देखने को मिले हैं। उन्होंने कई प्रमुख सरकारी योजनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि इनसे महिलाओं के जीवन स्तर में सुधार आया है और उन्हें आत्मनिर्भर बनने में मदद मिली है। मुख्यमंत्री के अनुसार, Swachh Bharat Mission, Pradhan Mantri Ujjwala Yojana, Jal Jeevan Mission, Pradhan Mantri Jan Dhan Yojana, Pradhan Mantri Mudra Yojana और पोषण से जुड़ी योजनाओं ने महिलाओं की दैनिक जिंदगी को आसान बनाया है। उन्होंने कहा कि इन पहलों के जरिए महिलाओं को न सिर्फ बुनियादी सुविधाएं मिली हैं, बल्कि आर्थिक रूप से मजबूत होने का अवसर भी मिला है, जिससे वे समाज में अधिक सशक्त भूमिका निभा रही हैं।

तकनीकी बहानों से रोका गया विधेयक

उन्होंने कहा प्रधानमंत्री जी द्वारा ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023’ महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है।  सीएम ने बताया कि इस कानून के क्रियान्वयन में परिसीमन जैसी तकनीकी प्रक्रियाओं के कारण समय लग सकता है। इसी को ध्यान में रखते हुए सरकार ने इसे जल्द लागू करने के लिए आवश्यक संशोधनों का प्रस्ताव रखा। हालांकि, उनके अनुसार विपक्षी दलों ने तकनीकी मुद्दों को आधार बनाकर इस विधेयक के रास्ते में बाधाएं खड़ी करने का प्रयास किया। मुख्यमंत्री ने इसे महिलाओं को उनके अधिकारों से वंचित रखने की कोशिश बताते हुए कहा कि यह मुद्दा केवल एक विधेयक तक सीमित नहीं है, बल्कि देश की आधी आबादी के अधिकार और सम्मान से जुड़ा है।उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी पुरुष प्रतिनिधि के लिए अपनी सीट छोड़कर महिला को अवसर देना आसान नहीं होता। इसी वास्तविकता को ध्यान में रखते हुए ऐसा प्रारूप प्रस्तावित किया गया, जिसमें सीटों की संख्या बढ़ाकर महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित किया जा सके।

विपक्ष के तर्कों पर सवाल

उन्होंने कहा कि यह समझ से परे है कि जिस प्रस्ताव में सभी पक्षों के हितों का ध्यान रखा गया था, उस पर विपक्ष को आखिर आपत्ति किस बात की थी। सीएम ने आरोप लगाया कि विपक्षी दलों ने महिलाओं के हितों की उपेक्षा की, जबकि वही महिलाएं उन्हें वोट देकर सत्ता तक पहुंचाती हैं। उन्होंने कहा कि कुछ दल मुस्लिम महिलाओं के हितों की बात करते हैं, लेकिन इतिहास गवाह है कि शाह बानो  में जब सुप्रीम कोर्ट ने महिला के पक्ष में फैसला दिया, तब राजीव गांधी की सरकार ने कानून बनाकर उस निर्णय को पलट दिया, जिससे मुस्लिम महिलाओं के अधिकार प्रभावित हुए।

मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि तीन तलाक को समाप्त करने के मुद्दे पर भी विपक्ष ने स्पष्ट समर्थन नहीं दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि महिलाओं के अधिकारों के मुद्दे पर विपक्ष का रुख हमेशा अस्पष्ट और विरोधाभासी रहा है। ओबीसी महिलाओं के संदर्भ में “कोटे में कोटा” की मांग पर भी सीएम ने सवाल उठाते हुए कहा कि इसे केवल एक बहाने के तौर पर प्रस्तुत किया गया, जबकि पहले इस दिशा में कोई ठोस प्रयास नहीं किए गए। उन्होंने कहा कि विभिन्न तकनीकी और राजनीतिक मुद्दों जैसे सीटों की संख्या, परिसीमन और क्षेत्रीय संतुलन को आधार बनाकर विधेयक को टालने की कोशिश की गई।

महिलाओं के प्रति असंवेदनशील सोच पर प्रहार

उन्होंने कहा कि समय-समय पर कई नेताओं द्वारा महिलाओं के प्रति असम्मानजनक और आपत्तिजनक बयान दिए गए हैं, जो उनके दृष्टिकोण को उजागर करते हैं। सीएम ने अपने संबोधन में दिग्विजय सिंह, मुलायम सिंह यादव, आजम खान जैसे नेताओं की पूर्व टिप्पणियों का जिक्र करते हुए कहा कि इस तरह के बयान उनकी “विकृत सोच” को दर्शाते हैं। उन्होंने आगे कहा कि केवल पुरुष नेता ही नहीं, बल्कि कुछ महिला नेताओं के बयान भी निराशाजनक रहे हैं। इस संदर्भ में उन्होंने ममता बनर्जी और प्रियंका गांधी के कथित बयानों का उल्लेख करते हुए कहा कि इस तरह की टिप्पणियां विरोधाभास को सामने लाती हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि समाज, खासकर देश की महिलाएं, ऐसे व्यवहार और सोच को कभी नहीं भूलतीं। उन्होंने जोर देकर कहा कि महिला सम्मान केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी है, और इस पर सभी दलों को गंभीरता से काम करना चाहिए।

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