DHARMA DESK: देश में नारद जयंती का पर्व श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जा रहा है। ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाई जाने वाली यह जयंती देवर्षि नारद के जन्मोत्सव के रूप में विशेष महत्व रखती है। पंचांग के अनुसार यह 3 मई की रात 3:02 बजे तक तिथि रहेगी।

नारद जी को ब्रह्मा जी के मानस पुत्र और तीनों लोकों के संदेशवाहक के रूप में जाना जाता है। वे भगवान विष्णु के परम भक्त हैं और नारायण-नारायण का निरंतर जाप करते रहते हैं। धार्मिक मान्यता है कि वे भक्तों की प्रार्थनाएं भगवान तक पहुंचाते हैं । उनकी पूजा से ज्ञान, बुद्धि और सकारात्मक ऊर्जा की प्राप्ति होती है। वहीं विष्णु-लक्ष्मी की कृपा से जीवन में सुख-समृद्धि और शांति बनी रहती है।

धर्म प्रचार में नारद जी की अहम भूमिका

नारद जी धर्म के प्रचार और लोक-कल्याण के लिए सदैव सक्रिय रहे हैं। शास्त्रों में उन्हें भगवान का मन कहा गया है, जिससे उनकी महत्ता और बढ़ जाती है। सभी युगों और लोकों में उनका विशेष स्थान रहा है। देवताओं के साथ-साथ दानवों ने भी उन्हें आदर दिया। समय-समय पर उनसे परामर्श लिया। श्रीमद्भगवद्गीता में भी भगवान श्रीकृष्ण ने उनके महत्व को स्वीकार किया है।

कुल्लू में नारद मुनि से जुड़ी अनोखी परंपरा

हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले के नीणू गांव में नारद मुनि को लेकर एक अनोखी मान्यता आज भी प्रचलित है। यहां के लोग मानते हैं कि देवता नारद मुनि प्राकृतिक आपदाओं से पहले ही चेतावनी देते हैं। मौसम को नियंत्रित करने की शक्ति रखते है। दशहरा उत्सव में भी उनकी विशेष भूमिका होती है। जहां वे सात दिनों तक ढालपुर मैदान स्थित मंदिर में विराजमान रहते हैं, जब तक नारद मुनि भगवान राम के दरबार में नहीं पहुंचते, तब तक राजपरिवार अन्न-जल ग्रहण नहीं करता। नीणू गांव में स्थापित उनका मोहरा 1900 साल से भी अधिक पुराना बताया जाता है, जो आज भी आस्था का केंद्र बना हुआ है।