Dharm Desk – उत्तराखंड में चारधाम यात्रा की शुरुआत अक्षय तृतीया से हो चुकी है. केदारनाथ धाम के कपाट आज 22 अप्रैल को खुले, जबकि अगले दिन बद्रीनाथ धाम के द्वार भी श्रद्धालुओं के लिए खोले जाएंगे. हिमालय की गोद में बसे केदारनाथ धाम को भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में विशेष स्थान प्राप्त है, यह पंचकेदार में सर्वोच्च माना जाता है.

इस धाम की उत्पत्ति नर-नारायण ऋषि की कठोर तपस्या से जुड़ी है. उनकी आराधना से प्रसन्न होकर भगवान शिव यहां ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए. केदार घाटी में स्थित नर और नारायण पर्वत इस तपोभूमि के साक्षी माने जाते हैं. इतिहास की बात करें तो वर्तमान मंदिर का निर्माण आदि गुरु आदि शंकराचार्य ने 8वीं शताब्दी में कराया था. कहा जाता है कि यह मंदिर करीब 400 वर्षों तक बर्फ में दबा रहा, फिर भी इसकी संरचना सुरक्षित बनी रही है. मंदिर के पीछे ही उनकी समाधि भी स्थित है.

केदारनाथ धाम का एक अद्भुत रहस्य यह है कि सर्दियों में कपाट बंद होने के बाद भी मंदिर के भीतर दीपक 6 माह तक जलता रहता है, जबकि उस दौरान वहां कोई नहीं रहता है. यह घटना भक्तों के लिए आज भी आस्था और आश्चर्य का विषय बनी हुई है.

2013 की विनाशकारी उत्तराखंड बाढ़ में जहां पूरा क्षेत्र तबाह हो गया था, वहीं मंदिर सुरक्षित रहा हैं. एक विशाल चट्टान मंदिर के पीछे आकर रुक गई, जिसने बाढ़ के पानी को दो भागों में बांट दिया और मंदिर को बचा लिया.

मंदिर की वास्तुकला भी रहस्य से कम नहीं दिखती है. विशाल पत्थरों से बने इस मंदिर को इतनी ऊंचाई पर कैसे तैयार किया गया, यह आज भी अनसुलझा प्रश्न है. इसके अलावा यहां की प्रकृति भी बेहद रहस्यमयी है. जहां मौसम पलभर में बदल जाता है और पांच नदियों का संगम इसे और भी पवित्र बनाता है.

मान्यता है कि भविष्य में नर-नारायण पर्वत मिल जाएंगे. जिससे यह धाम लुप्त हो जाएगा. ‘भविष्य बद्री’ का उदय होगा. साथ ही केदारनाथ और रामेश्वरम मंदिर एक ही सीध में स्थित माने जाते हैं. जो शिव के पंचभूत स्वरूप का प्रतिनिधित्व करते हैं.